ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)
Brahmasphuta Siddhanta of Brahmagupta with Commentary
by आचार्य ब्रह्मगुप्त
DevanagariHindipublished737 pages
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( ८३ )
त्रित्रिभलग्नान्तारजीवा³ घटिकादिलम्बनं लब्धम् ।
वित्रिभलग्नापक्रमविक्षेपाक्षांश⁴युतिवियुति² (ते) ॥ २३ ॥
जीवा शशांकभास्करमध्यमभुक्तांतरेण संगुणिता³ ।
पंचदश-भिर्गुणिंतं² या विभाजिता त्रिज्यया वनति⁴ ॥ २४ ॥
४६०५० पूर्ववदन्यत्स्पष्टं¹ ब्रह्मोक्त³स्पष्टसूर्य्यशशिपातैः ।
नार्थ्यभटादिभिरुक्तै⁵ र्यौ² तो स्फुटास्ते ततो स्पष्टम्⁶ ॥ २५ ॥
२३. (घ) १. भितृ लग्नाकांतार (ग) वित्रिभ लग्नाकांतारे for (त्रित्रिभलग्नाकांतार)
२. वियुते (ग) (च) for (वियुति (ते) )
(ग) ३. जीवाद्य for (जीवाद्य)
४. विक्षपाक्षांश for (विक्षेपाक्षांश)
(क) यहाँ श्लोक की प्रथम पंक्ति लिपिकार लिखना भूल गया । दूसरी है—
"वित्तिभलग्नापक्रमविक्षे पक्षांशयुतिवियुतेः ॥ २३ ॥"
(च) १. वित्रिभलग्नाक्रांतार for (त्रित्रिभलग्नाकांतार)
२४. (घ) १. मध्यमभुक्त्यंतरेण (ग) (क) (च) for (मध्यभुक्तांतरेण)
२. गुणितं (ग) गुणिंतया (क) for (गुंणिंतं)
(ग) ३. संगणिता for (संगुणिता)
४. वनतिः (क) for (वनति)
२५. (घ) १. पूर्ववदन्यत्स्पष्टं (क) (च) for (पूर्ववदन्यस्पष्टं)
२. यतो (ग) यतोऽस्फुटा (क) यतोऽस्फुटस्ते for (र्यंतो स्फुटास्ते)
(ग) ३. ब्रह्मोक्तं for (ब्रह्मोक्त)
४. स्तैततोऽस्पष्टाम् (क) स्तेततोऽस्पष्टम् for (स्तेततो स्पष्टम्)
(क) ५. रुच्चैक्तं for (रुक्तै)
(च) २. र्यंतो for (र्यंतो)
६. वि०—यहां चिह्न लगाकर ऊपर के रिक्तोपान्त पर निम्नलिखित श्लोक—
किसी अन्य हाथ से लिखा हुआ विद्यमान है—
"अंगुलमात्र विरते रक्तः शशिमंडले भवेत्कर्णः ।
भानोस्तु पुन क्रदमो वर्णं सर्वत्र निर्दिष्टः ॥"