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ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished810 pages

Page 665 of 810

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Page 665

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६५५
मुझको छुट्टी दे दो। तुम मेरे प्राणोंकी अधिष्ठात्री
देवी हो। तुममें ही मेरे प्राण बसते हैं। प्रिये !
प्राणी अपने प्राणोंको छोड़कर कहाँ ठहर सकता
है ? तुममें ही सदा मेरा मन लगा रहता है, तुमसे
बढ़कर प्यारी मेरे लिये दूसरी कोई नहीं है।
केवल तुम्हीं मुझे शंकरसे अधिक प्रिय हो। यह
सत्य है शंकर मेरे प्राण हैं; परंतु सती राधे ! तुम
तो प्राणोंसे भी बढ़कर हो।
यों कहकर भगवान् वहाँसे जानेको उद्यत
हुए। वे सर्वज्ञ और सब कुछ सिद्ध करनेवाले हैं।
सबके आत्मा, पालक और उपकारक हैं। उन्होंने
अक्रूरका आगमन जानकर ब्रजमें जानेका विचार
किया। श्रीकृष्णका मन बँट गया है; वे अन्यत्र
जानेको उत्सुक हैं; यह देख राधिका देवी
व्यथित-हृदयसे बोलीं।
राधिकाने कहा- हे नाथ ! हे रमणश्रेष्ठ !
प्रिय लगनेवाले मेरे समस्त सम्बन्धियोंमें तुम्हीं
श्रेष्ठ हो। प्राणनाथ ! मैं देखती हूँ, इस समय
तुम्हारा मन बँटा हुआ है। तुम्हारे चले जानेपर
मेरा प्रेम और सौभाग्य सब कुछ लुट जायगा।
मुझे शोकके गहरे समुद्रमें डालकर तुम कहाँ चले
जा रहे हो ? मैं विरहसे व्याकुल हूँ, दीन हूँ और
तुम्हारी ही शरणमें आयी हूँ। अब मैं फिर घरको
नहीं लौटूँगी; दूसरे वनमें चली जाऊँगी और
दिन-रात 'कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !' का गान करती
रहूँगी अथवा किसी वनमें भी नहीं जाऊँगी,
प्रेमके समुद्रमें प्रवेश करूँगी और मनमें केवल
तुम्हारी कामना लेकर शरीरको त्याग दूँगी। जैसे
आकाश, आत्मा, चन्द्रमा और सूर्य सदा साथ
रहते हैं; उसी तरह तुम मेरे आँचलमें बँधकर
सदा पास ही रहते और साथ-साथ घूमते हो;
किंतु दीनवत्सल ! इस समय तुम मुझे निराश करके
जा रहे हो ! मुझ दीन एवं शरणागत अबलाको
त्याग देना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है। ब्रह्मा,
विष्णु तथा शिव आदि देवता जिनके चरणकमलोंका
ध्यान करते हैं; वे परमात्मा तुम हो। तुमने मायासे
गोपवेष धारण कर रखा है। मैं ईर्ष्यालु नारी तुम्हें
कैसे जान सकती हूँ? देव ! मैंने तुम्हें पति
समझकर अथवा अभिमानके कारण तुम्हारे प्रति
जो दुर्नीतिपूर्ण बर्ताव तथा सहस्रों अपराध किये
हैं; उन्हें क्षमा कर दो। मेरा गर्व चूर्ण हो गया और
मेरे सारे मनसूबे दूर चले गये। अपने सौभाग्यको
आज मैं अच्छी तरह समझ चुकी हूँ। नाथ ! इसके
सिवा, तुमसे और क्या कह सकती हूँ? गर्गके
मुखसे तुम्हारे विषयमें सुनकर, जानकर भी मैं
तुम्हारी मायासे मोहित हो गयी। इस समय
प्रेमातिरेक अथवा भक्तिपाशसे बँधकर मैं तुमसे
कुछ कह नहीं सकती। प्राणवल्लभ ! प्रभो ! तुम्हारे
बिना मुझे एक-एक क्षण सौ युगोंके समान जान
पड़ता है; फिर सौ वर्षोंतक मैं किस तरह जीवन
धारण कर सकूँगी ?
मुने ! ऐसा कहकर राधिका भूमिपर गिर
पड़ीं और सहसा मूर्च्छित हो चेतना खो बैठीं।
उन्हें मूर्च्छित देख कृपानिधान श्रीकृष्णने कृपापूर्वक
सचेत किया और हृदयसे लगा लिया। फिर
शोकहारी योगोंद्वारा उन्हें अनेक प्रकारसे समझाया
तथापि शुचिस्मिता श्रीराधा शोकको त्याग न
सकीं। सामान्य वस्तुका बिछोह भी मनुष्योंके
लिये शोकप्रद हो जाता है, फिर जहाँ देह और
आत्माका बिछोह होता हो, वहाँ सुख कैसे हो
सकता है? उस दिन व्रजराज श्यामसुन्दर ब्रजमें
नहीं लौट सके। श्रीराधाके साथ क्रीड़ा-सरोवरके
तटपर गये। वहाँ उनके साथ भगवान्ने पुनः
रास-क्रीड़ा की। तदनन्तर आनन्दमग्ना राधिकाजी
सो गयीं।
इसी समय लोकपितामह ब्रह्माजी शिव, शेष
आदि देवताओं तथा मुनीन्द्रोंके साथ वहाँ आये।
आकर उन्होंने धरतीपर माथा टेक प्रणाम किया
और हाथ जोड़ वे उन परिपूर्णतम परमेश्वरका
सामवेदोक्त स्तोत्रसे स्तवन करने लगे।