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ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished810 pages

Page 664 of 810

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Page 664
६५४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

होनेसे ही मैं देवताओंका राजा इन्द्र हूँ; तुम्हारे बिना तो मैं श्रीहीन हो जाऊँगा। मैं ही अपनी कलासे धर्म हूँ और तुम धर्मकी पत्नी मूर्ति हो। यदि धर्म-क्रियारूपिणी तुम साथ न दो तो मैं धर्मकृत्यके सम्पादनमें असमर्थ हो जाऊँ। मैं ही कलासे यज्ञरूप हूँ और तुम अपने अंशसे दक्षिणा हो। तुम्हारे साथ ही मैं यज्ञफलका दाता हूँ; तुम न हो तो मैं फल देनेमें कदापि समर्थ न होऊँ। मैं ही अपनी कलासे पितृलोक हूँ और तुम अपने अंशसे सती स्वधा हो। तुम्हारे सहयोगसे ही मैं कव्य (श्राद्ध)-दानमें समर्थ होता हूँ; तुम न हो तो मैं उसमें कदापि समर्थ न हो सकूँगा। मैं पुरुष हूँ और तुम प्रकृति हो; तुम्हारे बिना मैं सृष्टि नहीं कर सकता। ठीक वैसे ही, जैसे कुम्हार मिट्टीके बिना घड़ा नहीं बना सकता। तुम सम्पत्तिरूपिणी हो और मैं तुम्हारे साथ उस सम्पत्तिका ईश्वर हूँ। लक्ष्मीस्वरूपा तुमसे संयुक्त होकर ही मैं लक्ष्मीवान् बना हूँ; तुम्हारे न होनेसे तो मैं सर्वथा लक्ष्मीहीन ही हूँ। मैं कलासे शेषनाग हुआ हूँ और तुम अपने अंशसे वसुधा हो। सुन्दरि! शस्य तथा रत्नोंकी आधारभूता तुमको मैं अपने मस्तकपर धारण करता हूँ। तुम कान्ति, शान्ति, मूर्तिमती, सद्द्भूति, तुष्टि, पुष्टि, क्षमा, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा, परा, दया, निद्रा, शुद्धा, तन्द्रा, मूर्च्छा, संनति और क्रिया हो। मूर्ति और भक्ति तुम्हारी ही स्वरूपभूता हैं। तुम्हीं देहधारियोंकी देह हो; सदा मेरी आधारभूता हो और मैं तुम्हारा आत्मा हूँ। इस प्रकार हम दोनों एक-दूसरेके शरीर और आत्मा हैं। जैसी तुम, वैसा मैं; दोनों सम—प्रकृति-पुरुषरूप हैं। देवि! हममेंसे एकके बिना भी सृष्टि नहीं हो सकती।

नारद! इस प्रकार परमप्रसन्न परमात्मा श्रीकृष्णने प्राणाधिका प्रिया श्रीराधाको हृदयसे लगाकर बहुत समझाया-बुझाया। फिर वे पुष्प-शय्यापर सो गये।

(अध्याय ६६-६७)

श्रीकृष्णको ब्रजमें जाते देख राधाका विलाप एवं मूर्च्छा, श्रीहरिका उन्हें समझाना, श्रीराधाके सो जानेपर ब्रह्मा आदि देवताओंका आना और स्तुति करके श्रीकृष्णको मथुरा जानेके लिये प्रेरित करना, श्रीकृष्णका जाना, श्रीराधाका उठना और प्रियतमके लिये विलाप करके मूर्च्छित होना, श्रीकृष्णका लौटकर आना, रत्नमालाका श्रीकृष्णको राधाकी अवस्था बताना, श्रीकृष्णका राधाके लिये स्वप्नमें मिलनेका वरदान देकर ब्रजमें जाना

**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद! पुरातन परमेश्वर श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने पुष्पशय्यासे उठकर निद्रामें निमग्न हुई अपनी प्राणोपमा प्रियतमा श्रीराधाको तत्काल ही जगाया। वस्त्रके अञ्चलसे उनके मुँहको पोंछ निर्मल करके मधुसूदनने मधुर एवं शान्त वाणीमें उनसे कहा।

**श्रीकृष्ण बोले—**पवित्र मुस्कानवाली रासेश्वरि! व्रजस्वामिनि! क्षणभर रासमण्डलमें ही ठहरो अथवा वृन्दावनमें घूमो या गोष्ठमें ही चली जाओ। अथवा तुम रासकी अधिष्ठात्री देवी हो; इसलिये क्षणभर इस रासमण्डलमें ही रासरसका आस्वादन करो। जैसे ग्राम-ग्राममें सर्वत्र ग्रामदेवता रहते हैं, उसी तरह रासेश्वरीको रासमें सदा रहना चाहिये। अथवा सुन्दरि! तुम अपनी प्यारी सखियोंके साथ क्षणभरके लिये चन्दनवन या चम्पकवनमें घूम आओ, या यहीं रहो; मैं कुछ क्षणके लिये घरको जाऊँगा, वहाँ मुझे एक विशेष कार्य करना है; अतः प्राणवल्लभे! थोड़ी देरके लिये प्रसन्नतापूर्वक