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ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished810 pages

Page 108 of 810

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Page 108

९८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


नारद! समस्त ब्राह्मणोंके लिये जो अभक्ष्य है, उसका वर्णन सुनो। ताँबेके पात्रमें दूध पीना, जूठे बर्तन या अन्नमें घी लेकर खाना तथा नमकके साथ दूध पीना तत्काल गोमांस-भक्षणके समान माना गया है। काँसके बर्तनमें रखा हुआ एवं जो द्विज उठकर बायें हाथसे जल पीता है, वह शराबी माना गया है और समस्त धर्मोंसे बहिष्कृत है। मुने! भगवान् श्रीहरिको निवेदित न किया गया अन्न, खानेसे बचा हुआ जूठा भोजन तथा पीनेसे शेष रहा जूठा जल—ये सब सर्वथा निषिद्ध हैं। कार्तिकमें बैगनका फल, माघमें मूली तथा श्रीहरिके शयनकाल (चौमासे)-में कलम्बींका शाक सर्वथा नहीं खाना चाहिये। सफेद ताड़, मसूर और मछली—ये सभी ब्राह्मणोंके लिये समस्त देशोंमें त्याज्य हैं। प्रतिपदाको कूष्माण्ड (कोहड़ा) नहीं खाना चाहिये; क्योंकि उस दिन वह अर्थका नाश करनेवाला है। द्वितीयाको बृहती (छोटे बैगन अथवा कटेहरी) भोजन कर ले तो उसके दोषसे छुटकारा पानेके लिये श्रीहरिका स्मरण करना चाहिये। तृतीयाको परवल शत्रुओंकी वृद्धि करनेवाला होता है; अतः उस दिन उसे नहीं खाना चाहिये। चतुर्थीको भोजनके उपयोगमें लायी हुई मूली धनका नाश करनेवाली होती है। पञ्चमीको बेल खाना कलङ्क लगनेमें कारण होता है। षष्ठीको नीमकी पत्ती चबायी जाय या उसका फल या दाँतुन मुँहमें डाला जाय तो उस पापसे मनुष्यको पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। सप्तमीको ताड़का फल खाया जाय तो वह रोग बढ़ानेवाला तथा शरीरका नाशक होता है। अष्टमीको नारियलका फल खाया जाय तो उससे बुद्धिका नाश होता है। नवमीको लौकी और दशमीको कलम्बीका शाक सर्वथा त्याज्य है। एकादशीको शिम्बी (सेम), द्वादशीको पूतिका (पोई) और त्रयोदशीको बैगन खानेसे पुत्रका नाश होता है। मांस सबके लिये सदा वर्जित है।

पार्वणश्राद्ध और व्रतके दिन प्रातःकालिक स्नानके समय सरसोंका तेल और पकाया हुआ तेल उपयोगमें लाया जाय तो उत्तम है। अमावास्या, पूर्णिमा, संक्रान्ति, चतुर्दशी और अष्टमी तिथियोंमें, रविवारको, श्राद्ध और व्रतके दिन स्त्री-सहवास तथा तिलके तेलका सेवन निषिद्ध है। सभी वर्णोंके लिये दिनमें अपनी स्त्रीका भी सेवन वर्जित है। रातमें दही खाना, दिनमें दोनों संध्याओंके समय सोना तथा रजस्वला स्त्रीके साथ समागम करना—ये नरककी प्राप्तिके कारण हैं। रजस्वला तथा कुलटाका अन्न नहीं खाना चाहिये।

ब्रह्मर्षे! शूद्रजातीय स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मणका अन्न भी खाने योग्य नहीं है। ब्रह्मन्! सूदखोर और गणकका अन्न भी नहीं खाना चाहिये। अग्रदानी ब्राह्मण (महापात्र) तथा चिकित्सक (वैद्य या डाक्टर)-का अन्न भी खाने योग्य नहीं है। अमावास्या तिथि और कृत्तिका नक्षत्रमें द्विजोंके लिये क्षौर-कर्म (हजामत) वर्जित है। जो मैथुन करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करता है, उसका वह जल रक्तके समान होता है तथा उसे देनेवाला नरकमें पड़ता है। नारद! जो करना चाहिये, जो नहीं करना चाहिये, जो भक्ष्य है और जो अभक्ष्य है, वह सब तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहते हो? (अध्याय २७)


* जलज शाकविशेष अथवा कदम्ब।