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Read in contextब्रह्मखण्ड ९७
तत्पश्चात् विसर्जन करके पृथ्वीपर माथा टेककर प्रणाम करे। इस तरह देवपूजा सम्पन्न करके बुद्धिमान् एवं विद्वान् पुरुष श्रौत तथा स्मार्त अग्निसे युक्त यज्ञका अनुष्ठान करे। मुने! यज्ञके पश्चात् दिक्पाल आदिको बलि देनी चाहिये। फिर यथाशक्ति नित्य-श्राद्ध और अपने वैभवके अनुसार दान करे। यह सब करके पुण्यात्मा साधक आवश्यक आहार-विहारमें प्रवृत्त हो। श्रुतिमें पूजनका यही क्रम सुना गया है। नारद! इस प्रकार मैंने तुमसे सम्पूर्ण वेदोक्त उत्तम सूत्रका तथा ब्राह्मणोंके आह्निक कर्मका वर्णन किया। अब और क्या सुनना चाहते हो? (अध्याय २६)
ब्राह्मणोंके लिये भक्ष्याभक्ष्य तथा कर्तव्याकर्तव्यका निरूपण
नारदजीने पूछा— प्रभो! गृहस्थ ब्राह्मणों, यतियों, वैष्णवों, विधवा स्त्रियों और ब्रह्मचारियोंके लिये क्या भक्ष्य है और क्या अभक्ष्य? क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य? अथवा उनके लिये क्या भोग्य है और क्या अभोग्य? आप सर्वज्ञ, सर्वेश्वर और सबके कारण हैं, अतः मेरी पूछी हुई सब बातें बताइये।
महादेवजीने कहा— मुने! कोई तपस्वी ब्राह्मण चिरकालतक मौन रहकर बिना आहारके ही रहता है। कोई वायु पीकर रह जाता है और कोई फलाहारी होता है। कोई गृहस्थ ब्राह्मण अपनी स्त्रीके साथ रहकर यथोचित समयपर अन्न ग्रहण करता है। ब्रह्मन्! जिनकी जैसी इच्छा होती है, वे उसीके अनुसार आहार करते हैं; क्योंकि रुचियोंका स्वरूप भिन्न-भिन्न प्रकारका होता है। गृहस्थ ब्राह्मणोंके लिये हविष्यान्न-भोजन सदा उत्तम माना गया है। भगवान् नारायणका उच्छिष्ट प्रसाद ही उनके लिये अभीष्ट भोजन है। जो भगवान्को निवेदित नहीं हुआ है, वह अभक्षणीय है। जो भगवान् विष्णुको अर्पित नहीं किया गया, वह अन्न विष्ठा और जल मूत्रके समान है। एकादशीके दिन सब प्रकारका अन्न-जल मल-मूत्रके तुल्य कहा गया है। जो ब्राह्मण एकादशीके दिन स्वेच्छासे अन्न खाता है, वह पाप खाता है, इसमें संशय नहीं है। नारद! एकादशीका दिन प्राप्त होनेपर गृहस्थ ब्राह्मणोंको कदापि अन्न नहीं खाना चाहिये, नहीं खाना चाहिये, नहीं खाना चाहिये। जन्माष्टमीके दिन, रामनवमीके दिन तथा शिवरात्रिके दिन जो अन्न खाता है, वह भी दूने पातकका भागी होता है। जो सर्वथा उपवास करनेमें समर्थ न हो, वह फल-मूल और जल ग्रहण करे; अन्यथा उपवासके कारण शरीर नष्ट हो जानेपर मनुष्य आत्महत्याके पापका भागी होता है। जो व्रतके दिन एक बार हविष्यान्न खाता अथवा भगवान् विष्णुके नैवेद्यमात्रका भक्षण करता है, उसे अन्न खानेका पाप नहीं लगता। वह उपवासका पूरा फल प्राप्त कर लेता है।*
नारद! गृहस्थ, शैव, शाक्त, विशेषतः वैष्णव यति तथा ब्रह्मचारियोंके लिये यह बात बतायी गयी है। जो वैष्णव पुरुष नित्य भगवान् श्रीकृष्णके नैवेद्य (प्रसाद)-का भोजन करता है, वह जीवन्मुक्त हो प्रतिदिन सौ उपवास-व्रतोंका फल पाता है। सम्पूर्ण देवता और तीर्थ उसके अङ्गोंका स्पर्श चाहते हैं। उसके साथ वार्तालाप तथा उसका दर्शन समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। यतियों, विधवाओं और ब्रह्मचारियोंके लिये ताम्बूल-भक्षण निषिद्ध है।
* उपवासासमर्थश्च फलमूलजलं पिबेत्। नष्टे शरीरे स भवेदन्यथा चात्मघातकः॥
सकृद् भुंक्ते हविष्यान्नं विष्णोर्नैवेद्यमेव च। न भवेत् प्रत्यवायी स चोपवासफलं लभेत्॥
(ब्रह्मखण्ड २७।१२-१३)