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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished434 pages

२३- कार्तवीर्य अर्जुनकी समुद्रमें जलक्रीडा

Page 41Permalink
  • ययाति-पुत्रोंके वंशका वर्णन * ३९

जब वे अपनी सहस्रों भुजाएँ पटकते थे, उस समय पातालनिवासी महादैत्य निश्चेष्ट होकर भयसे छिप जाते थे। ऊँची उठती हुई उत्ताल तरङ्गैं विचूर्णित हो जाती थीं। बड़े-बड़े मीन और तिमि आदि जलजन्तु छटपटाने लगते थे। सागरके जलमें फेन जम जाता था। समुद्र बड़ी-बड़ी भँवरोंके कारण क्षुब्ध दिखायी देता था। देवताओं और असुरोंके डाले हुए मन्दराचल पर्वतसे क्षीरसमुद्रकी जो दशा हुई थी; वही दशा वे अपने सहस्र बाहुओंसे महासागरकी कर देते थे। उस समय मन्दराचलके द्वारा समुद्र-मन्थनकी बात सोचकर चकित और अमृतोत्पत्तिसे आशङ्कित हुए बड़े-बड़े नाग सहसा ऊपर उछलकर देखते और भयंकर कार्तवीर्य नरेशपर दृष्टि पड़ते ही मस्तक झुकाकर निश्चेष्ट पड़ जाते थे। जैसे संध्याके समय वायुके झोंकेसे कदलीखण्ड काँपते हैं, उसी प्रकार वे भी काँपने लगते थे। राजा कार्तवीर्यने अभिमानसे भरे हुए लङ्कापति रावणको अपने पाँच ही बाणोंसे सेनासहित मूर्च्छित करके धनुषकी प्रत्यञ्चासे बाँध

लिया और माहिष्मतीपुरीमें लाकर बंदी बना लिया। यह समाचार सुनकर महर्षि पुलस्त्य उनके पास गये। महर्षिके याचना करनेपर उन्होंने रावणको मुक्त कर दिया। अर्जुनकी हजार भुजाओंमें धारण किये हुए धनुषोंकी प्रत्यञ्चाका इतना घोर शब्द होता था, मानो प्रलयकालीन मेघ गर्जते हों अथवा वज्र फट पड़ा हो। अहो! परशुरामजीका पराक्रम धन्य है, जिन्होंने सुवर्णमय तालवनके समान राजा कार्तवीर्यकी सहस्रों भुजाओंको काट डाला था। एक दिनकी बात है, प्यासे अग्निदेवने राजा कार्तवीर्यसे भिक्षा माँगी। उन्होंने सातों द्वीप, नगर, गाँव, गोष्ठ तथा सारा राज्य उन्हें भिक्षामें दे दिये। अग्निदेव सर्वत्र प्रज्वलित हो उठे और महाराज कार्तवीर्यके प्रभावसे समस्त पर्वतों एवं वनोंको जलाने लगे। उन्होंने वरुणपुत्रके रमणीय आश्रमको भी जला दिया। पूर्वकालमें वरुणने जिस तेजस्वी महर्षिको अपने पुत्ररूपमें प्राप्त किया था, वे वसिष्ठके नामसे विख्यात हुए। उन्हींका नाम आपव भी है। महर्षि वसिष्ठका शून्य आश्रम जलाया गया था, इसलिये