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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished434 pages

Page 43 of 434

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Page 43
  • क्रोष्टु आदिके वंशका वर्णन तथा स्यमन्तकमणिकी कथा * ४१

नरेशके राज्यमें पूरे तीन वर्षोंतक इन्द्रने वर्षा नहीं की; तब उन्होंने श्वफल्कको बुलवाया और उनका बड़ा आदर-सत्कार किया। श्वफल्कके वहाँ पहुँचते ही इन्द्रने वृष्टि आरम्भ कर दी। काशिराजके एक कन्या थी, जिसका नाम गान्दिनी रखा गया था। वह प्रतिदिन ब्राह्मणको एक गौ दान किया करती थी, इसीलिये उसका ऐसा नाम पड़ा था। वह श्वफल्कको पत्नीरूपमें प्राप्त हुई और उसके गर्भसे अक्रूरका जन्म हुआ, जो दानी, यज्ञकर्ता, वीर, शास्त्रज्ञ, अतिथिप्रेमी तथा अधिक दक्षिणा देनेवाले थे। इनके अतिरिक्त उपमद्गु, मद्गु, मेदुर, अरिमेजय, अविक्षित, आक्षेप, शत्रुघ्न, अरिमर्दन, धर्मधृक्, यतिधर्मा, धर्मोक्षा, अन्धकरु, आवाह तथा प्रतिवाह नामक पुत्र एवं वराङ्गना नामकी सुन्दरी कन्या हुई। अक्रूरके उग्रसेनकन्या सुगात्रीके गर्भसे प्रसेन और उपदेव नामक दो पुत्र हुए, जो देवताओंके समान कान्तिमान् थे।

चित्रकके पृथु, विपृथु, अश्वग्रीव, अश्वबाहु, स्वपार्श्वक, गवेषण, अरिष्टनेमि, अश्व, सुधर्मा, धर्मभृत्, सुबाहु तथा बहुबाहु नामक पुत्र एवं श्रविष्ठा और श्रवणा नामकी दो कन्याएँ हुईं। देवमीढुषने असिक्नी नामकी पत्नीके गर्भसे शूर नामक पुत्र उत्पन्न किया। शूरसे रानी भोज्याके गर्भसे दस पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें सबसे पहले महाबाहु वसुदेव उत्पन्न हुए, जिन्हें आनकदुन्दुभि भी कहते हैं। उनके जन्म लेनेके बाद देवलोकमें दुन्दुभियाँ बजी थीं और आनकों (मृदङ्गों)-की गम्भीर ध्वनि हुई थी; इसलिये उनका नाम आनकदुन्दुभि पड़ गया था। उनके जन्म-कालमें फूलोंकी वर्षा भी हुई थी। समस्त मानव-लोकमें उनके समान रूपवान् दूसरा कोई नहीं था। नरश्रेष्ठ वसुदेवकी कान्ति चन्द्रमाके समान थी। वसुदेवके बाद क्रमशः—देवभाग, देवश्रवा, अनाधृष्टि, कनवक्र, वत्सवान्, गृञ्जम, श्याम, शमीक और गण्डूष उत्पन्न हुए। शूरके पाँच सुन्दरी कन्याएँ भी हुईं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—पृथुकीर्ति, पृथा, श्रुतदेवा, श्रुतश्रवा तथा राजाधिदेवी। ये पाँचों वीर पुत्रोंकी जननी हुईं। वृष्णिके छोटे पुत्र अनमित्रसे शिनिका जन्म हुआ। शिनिके पुत्र सत्यक हुए। सत्यकसे सात्यकि उत्पन्न हुए, जिनका दूसरा नाम युयुधान था। देवभागके पुत्र महाभाग उद्धव हुए। गण्डूषके कोई पुत्र नहीं था, अतः विष्वक्सेनने उन्हें अनेक पुत्र दिये। उनके नाम इस प्रकार हैं—चारुदेष्ण, सुदेष्ण तथा सर्वलक्षणसम्पन्न पञ्चाल आदि। उन सबमें छोटे थे—महाबाहु रौक्मिणेय, जो युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते थे। कनवक्रके दो पुत्र हुए—तन्त्रिज और तन्त्रिपाल। गृञ्जमके भी दो पुत्र थे—वीरु तथा अश्वहनु। श्यामके पुत्र शमीक थे। शमीक राजा हुए। उन्होंने राजसूययज्ञ किया था, उनके पुत्र अजातशत्रु हुए।

अब वसुदेवके वीर पुत्रोंका वर्णन करूँगा। वृष्णिवंशकी अनेक शाखाएँ हैं। जो उसका स्मरण करता है, उसे कभी अनर्थकी प्राप्ति नहीं होती। वसुदेवजीके चौदह सुन्दरी पत्नियाँ थीं। पुरुवंशकी कन्या रोहिणी, मदिरादि, वैशाखी, भद्रा, सुनाम्नी, सहदेवा, शान्तिदेवा, श्रीदेवी, देवरक्षिता, वृकदेवी, उपदेवी तथा देवकी—ये बारह तो राजकुमारियाँ थीं और सुतनु तथा बड़वा—ये दो दासियाँ थीं ज्येष्ठ पत्नी रोहिणीने, जो बाह्लीककी पुत्री थी, वसुदेवजीसे ज्येष्ठ पुत्रके रूपमें बलरामजीको प्राप्त किया। तत्पश्चात् उनके गर्भसे शरण्य, शठ, दुर्दम, दमन, शुभ्र, पिण्डारक और उशीनर नामक पुत्र तथा चित्रा नामकी कन्या हुई। इस प्रकार रोहिणीकी नौ संतानें थीं। चित्रा ही आगे चलकर