संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
by महर्षि वेदव्यास
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उन्होंने शाप दिया—'हैहय! तूने मेरे इस वनको भी जलाये बिना न छोड़ा, अतः तेरे द्वारा यह महान् पाप हुआ है। इस कारण मेरे-जैसा एक दूसरा तपस्वी ब्राह्मण तेरा वध करेगा। जमदग्निनन्दन महाबाहु परशुराम, जो बलवान् और प्रतापी हैं, तेरा बलपूर्वक मान-मर्दन करके तेरी हजार भुजाओंको काट डालेंगे और तुझे मौतके घाट उतारेंगे।'
जो शत्रुओंके नाशक और धर्मपूर्वक प्रजाके रक्षक थे, जिनके प्रतापसे किसीके धनका नाश नहीं होने पाता था, वे महाराज कार्तवीर्य महामुनि वसिष्ठके शापवश परशुरामजीके हाथसे मृत्युको प्राप्त हुए। उन्होंने स्वयं ही पहले इसी तरहका वर माँगा था। कार्तवीर्यके सौ पुत्र थे, किन्तु उनमें पाँच ही शेष बचे। वे सभी अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता, बलवान्, शूर, धर्मात्मा और यशस्वी थे। उनके नाम ये हैं—शूरसेन, शूर, वृषण, मधुध्वज और जयध्वज। जयध्वज अवन्तीके महाराज थे। जयध्वजके पुत्र महाबली तालजङ्घ हुए। उनके सौ पुत्र थे, जो तालजङ्घके नामसे विख्यात थे। हैहयवंशमें वीतिहोत्र, सुजात, भोज, अवन्ति, तौण्डिकेर, तालजङ्घ तथा भरत आदि क्षत्रियोंका समुदाय हुआ। इनकी संख्या बहुत होनेसे पृथक्-पृथक् नाम नहीं बतलाये गये।
वृष आदि बहुत-से पुण्यात्मा यादव इस पृथ्वीपर उत्पन्न हुए। उनमें वृष वंशके प्रवर्तक थे। वृषके पुत्र मधु थे। मधुके सौ पुत्र हुए, जिनमें वृषण वंश चलानेवाले हुए; वृषणके वृष्णि और मधुके वंशज माधव कहलाये। इसी प्रकार यदुके नामपर यादव तथा हैहयके नामसे हैहय क्षत्रिय कहलाते हैं। जो प्रतिदिन कार्तवीर्य अर्जुनके जन्मका वृत्तान्त यहाँ कहेगा, उसके धनका नाश नहीं होगा, उसका नष्ट हुआ धन भी मिल जायगा। इस प्रकार ययाति-पुत्रोंके पाँच वंश यहाँ बतलाये गये, जो समस्त लोकोंको धारण करते हैं। यदुके वंशधर पुण्यात्मा क्रोष्टुके, जिनके कुलमें वृष्णिवंशावतंस श्रीहरि श्रीकृष्णरूपमें प्रकट हुए थे, वंशका वर्णन सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
क्रोष्टु आदिके वंशका वर्णन तथा स्यमन्तमणिकी कथा
लोमहर्षणजी कहते हैं—क्रोष्टुके गान्धारी और माद्री दो पत्नियाँ थीं। गान्धारीने महाबली अनमित्रको जन्म दिया तथा माद्रीके युधाजित् एवं देवमीढुष—ये दो पुत्र हुए; इन तीनोंका वंश पृथक्-पृथक् चला, जो वृष्णिकुलकी वृद्धि करनेवाला था। माद्रीके दो पुत्र और सुने जाते हैं—वृष्णि तथा अन्धक। वृष्णिके भी दो पुत्र थे—श्वफल्क और चित्रक। श्वफल्क बड़े धर्मात्मा थे। वे जहाँ रहते, वहाँ रोगका भय नहीं होता तथा वहाँ अनावृष्टि कभी नहीं होती थी। एक बार काशी-