संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context* ययाति-पुत्रोंके वंशका वर्णन * ३५
देवताओंने भी उनका सत्कार किया था। उन्होंने धर्मज्ञ उशीनर तथा महाबली तितिक्षु—ये दो पुत्र उत्पन्न किये। उशीनरकी पाँच पत्नियाँ थीं, जो राजर्षियोंके कुलमें उत्पन्न हुई थीं। उनके नाम इस प्रकार हैं—नृगा, कृमि, नवा, दर्वा तथा दृषद्वती। उनसे उशीनरके पाँच पुत्र हुए—नृगाके पुत्र नृग थे, कृमिके गर्भसे कृमिका ही जन्म हुआ था। नवाके नव तथा दर्वाके सुव्रत हुए। दृषद्वतीके गर्भसे उशीनरकुमार शिबिकी उत्पत्ति हुई। शिबिको शिबिदेशका राज्य मिला। नृगके अधिकारमें यौधेय प्रदेश आया। नवको नवराष्ट्र तथा कृमिको कृमिलापुरीका राज्य प्राप्त हुआ। सुव्रतके अधिकारमें अम्बष्ठ देश आया। शिबिके विश्वविख्यात चार पुत्र हुए— वृषदर्भ, सुवीर, केकय तथा मद्रक। उनके समृद्धिशाली जनपद उन्हींके नामसे प्रसिद्ध हुए।
अब महामनाके दूसरे पुत्र तितिक्षुकी संतानोंका वर्णन किया जाता है। तितिक्षु पूर्व दिशाके राजा थे। उनके पुत्र महापराक्रमी उषद्रथ हुए। उषद्रथके पुत्र फेन, फेनके सुतपा तथा सुतपाके बलि हुए। राजा बलि सोनेका तरकस रखते थे। वे बहुत बड़े योगी थे। उन्होंने इस भूतलपर वंशकी वृद्धि करनेवाले पाँच पुत्र उत्पन्न किये। उनमें सबसे पहले अङ्गकी उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् क्रमशः— वङ्ग, सुह्म, पुण्ड्र तथा कलिङ्ग उत्पन्न हुए। ये सब लोग बालेय क्षत्रिय कहलाते हैं। बलिके कुलमें बालेय ब्राह्मण भी हुए, जो वंशकी वृद्धि करनेवाले थे। ब्रह्माजीने प्रसन्न होकर बलिको यह वर दिया कि ‘तुम महायोगी होओगे। एक कल्पकी तुम्हारी आयु होगी। बलमें तुम्हारी समानता करनेवाला कोई न होगा। तुम धर्म-तत्त्वके ज्ञाता होओगे। संग्राममें तुम्हें कोई जीत न सकेगा। धर्ममें तुम्हारी प्रधानता होगी। तुम तीनों लोकोंकी देखभाल करोगे। सर्वत्र श्रेष्ठ माने जाओगे और चारों वर्णोंको मर्यादाके भीतर स्थापित करोगे।'
भगवान् ब्रह्माजीके यों कहनेपर बलिको बड़ी शान्ति मिली। वे दीर्घ कालके बाद मरकर स्वर्गको गये। उनके पाँच पुत्रोंके अधिकारमें जो जनपद थे, उनके नाम इस प्रकार हैं—अङ्ग, वङ्ग सुह्म, कलिङ्ग और पुण्ड्रक। अब अङ्गकी संतानका वर्णन करता हूँ। अङ्गके पुत्र महाराज दधिवाहन हुए। दधिवाहनके पुत्र राजा दिविरथ। दिविरथके इन्द्रतुल्य पराक्रमी और विद्वान् धर्मरथ तथा धर्मरथके पुत्र चित्ररथ हुए। राजा धर्मरथ जब कालञ्जर पर्वतपर यज्ञ करते थे, उस समय महात्मा इन्द्रने उनके साथ बैठकर सोमपान किया था। चित्ररथके पुत्र दशरथ हुए, जो लोमपादके नामसे विख्यात थे। उन्हींकी पुत्री शान्ता थी। दशरथके पुत्र महायशस्वी वीर चतुरङ्ग हुए, जो ऋष्यशृङ्ग मुनिकी कृपासे उत्पन्न हुए थे। चतुरङ्गके पुत्रका नाम पृथुलाक्ष था। पृथुलाक्षके पुत्र महायशस्वी चम्प थे। चम्पकी राजधानी चम्पा थी, जो पहले मालिनीके नामसे प्रसिद्ध थी। चम्पके पुत्र हर्यश्व हुए। हर्यश्वके पुत्र वैभाण्डकि थे, जिनका वाहन इन्द्रका ऐरावत हाथी था। उन्होंने मन्त्रद्वारा उस उत्तम हाथीको पृथ्वीपर उतारा था। हर्यश्वके पुत्र राजा भद्ररथ हुए, भद्ररथके बृहत्कर्मा, बृहत्कर्माके बृहद्धर्भ और बृहद्धर्भसे बृहन्मनाकी उत्पत्ति हुई थी। महाराज बृहन्मनाने जयद्रथ नामक पुत्र उत्पन्न किया। जयद्रथके दृढ़रथ, दृढ़रथके विश्वविजयी जनमेजय। उनके पुत्र वैकर्ण, वैकर्णके विकर्ण तथा विकर्णके सौ पुत्र हुए, जो अङ्गवंशका विस्तार करनेवाले थे। ये सब अङ्गवंशी राजा बतलाये गये, जो सत्यव्रती, महात्मा, पुत्रवान् तथा महारथी थे।
अब रौद्राश्वकुमार राजा ऋचेयुके वंशका वर्णन