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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished434 pages

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Page 36

३४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


मनुष्यके लिये भी पर्याप्त नहीं हैं—ऐसा समझकर विद्वान् पुरुष मोहमें नहीं पड़ता। जब जीव मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीके प्रति पाप-बुद्धि नहीं करता, तब वह ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। जब वह किसी भी प्राणीसे नहीं डरता तथा उससे भी कोई प्राणी नहीं डरते, जब वह इच्छा और द्वेषसे परे हो जाता है, उस समय ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। खोटी बुद्धिवाले पुरुषोंद्वारा जिसका त्याग होना कठिन है, जो मनुष्यके बूढ़े होनेपर भी बूढ़ी नहीं होती तथा जो प्राणनाशक रोगके समान है, उस तृष्णाका त्याग करनेवालेको ही सुख मिलता है। बूढ़े होनेवाले मनुष्यके बाल पक जाते हैं, दाँत टूट जाते हैं; परन्तु धन और जीवनकी आशा उस समय भी शिथिल नहीं होती। संसारमें जो कामजनित सुख है तथा जो दिव्य लोकका महान् सुख है, वे सब मिलकर तृष्णा-क्षयसे होनेवाले सुखकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते।'

यों कहकर राजर्षि ययाति स्त्रीसहित वनमें चले गये। वहाँ बहुत दिनोंतक उन्होंने भारी तपस्या की। तपस्याके अन्तमें भृगुतुङ्ग नामक तीर्थके भीतर उन्होंने सद्गति प्राप्त की। महायशस्वी ययातिने स्त्रीसहित उपवास करके देहका त्याग किया और स्वर्गलोकको प्राप्त कर लिया।

ययाति-पुत्रोंके वंशका वर्णन

**ब्राह्मण बोले—**सूतजी! हमलोग पूरु, द्रुह्यु, अनु, यदु तथा तुर्वसुके वंशोंका पृथक्-पृथक् वर्णन सुनना चाहते हैं।

**लोमहर्षणजीने कहा—**मुनिवरो! 'आपलोग महात्मा पूरुके वंशका विस्तारपूर्वक वर्णन सुनें, मैं क्रमशः सुनाता हूँ। पूरुके पुत्र सुवीर हुए, उनके पुत्रका नाम मनस्यु था। मनस्युके पुत्र राजा अभयद थे। अभयदके सुधन्वा, सुधन्वाके सुबाहु, सुबाहुके रौद्राश्व तथा रौद्राश्वके दशार्णेयु, कृकणेयु, कक्षेयु, स्थण्डिलेयु, संनतेयु, ऋचेयु, जलेयु, स्थलेयु, धनेयु एवं वनेयु—ये दस पुत्र हुए। इसी प्रकार भद्रा, शूद्रा, मद्रा, शलदा, मलदा, खलदा, नलदा, सुरसा, गोचपला तथा स्त्रीरत्नकूटा—ये दस कन्याएँ हुईं। अत्रिकुलमें उत्पन्न महर्षि प्रभाकर उन सबके पति हुए। उन्होंने भद्राके गर्भसे परम यशस्वी सोमको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया। राहुसे आहत होकर जब सूर्य आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगे और समस्त संसारमें अन्धकार छा गया, उस समय प्रभाकरने ही अपनी प्रभा फैलायी। महर्षिने गिरते हुए सूर्यको 'तुम्हारा कल्याण हो' यह कहकर आशीर्वाद दिया। उनके इस कथनसे सूर्य पृथ्वीपर नहीं गिरे। महातपस्वी प्रभाकरने सब गोत्रोंमें अत्रिको ही श्रेष्ठ बनाया। अत्रिके यज्ञमें देवताओंने उनके बलकी प्रतिष्ठा की। उन्होंने रौद्राश्वकी कन्याओंसे दस पुत्र उत्पन्न किये, जो महान् सत्त्वशाली तथा उग्र तपस्यामें तत्पर रहनेवाले थे। वे सभी वेदोंके पारङ्गत विद्वान् तथा गोत्रप्रवर्तक हुए। स्वस्त्यात्रेय नामसे उनकी ख्याति हुई। कक्षेयुके सभानर, चाक्षुष तथा परमन्यु—ये तीन महारथी पुत्र हुए। सभानरके पुत्र कालानल तथा कालानलके धर्मज्ञ सृञ्जय हुए। सृञ्जयके पुत्र वीर राजा पुरञ्जय थे। पुरञ्जयके पुत्रका नाम जनमेजय हुआ। जनमेजयके पुत्र महाशाल थे, जो देवताओंमें भी विख्यात हुए और इस पृथ्वीपर भी उनका यश फैला था। महाशालके पुत्र महामनाके नामसे विख्यात थे।