Skip to content
SarvaKosh
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished434 pages

Page 30 of 434

Read in context
Page 30

२८

* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


अनुष्ठान किया, जिसमें लाखोंकी दक्षिणा बाँटी गयी। उस यज्ञमें सिनी, कुहू, द्युति, पुष्टि, प्रभा, वसु, कीर्ति, धृति तथा लक्ष्मी—इन नौ देवियोंने चन्द्रमाका सेवन किया। यज्ञके अन्तमें अवभृथ-स्नानके पश्चात् सम्पूर्ण देवताओं तथा ऋषियोंने उनका पूजन किया। राजाधिराज सोम दसों दिशाओंको प्रकाशित करने लगे। महर्षियोंद्वारा सत्कृत वह दुर्लभ ऐश्वर्य पाकर चन्द्रमाकी बुद्धि भ्रान्त हो गयी। उनमें विनयका भाव दूर हो गया और अनीति आ गयी; फिर तो ऐश्वर्यके मदसे मोहित होकर उन्होंने बृहस्पतिकी पत्नी ताराका अपहरण कर लिया। देवताओं और देवर्षियोंके बारंबार प्रार्थना करनेपर भी उन्होंने बृहस्पतिको तारा नहीं लौटायी। तब ब्रह्माजीने स्वयं ही बीचमें पड़कर ताराको वापस कराया। उस समय वह गर्भिणी थी, यह देख बृहस्पतिने कुपित होकर कहा—'मेरे क्षेत्रमें तुम्हें दूसरेका गर्भ नहीं धारण करना चाहिये।' तब उसने तृणके समूहपर उस गर्भको त्याग दिया। पैदा होते ही उसने अपने तेजसे देवताओंके विग्रहको लज्जित कर दिया। उस समय ब्रह्माजीने तारासे पूछा—'ठीक-ठीक बताओ, यह किसका पुत्र है?' तब वह हाथ जोड़कर बोली—'चन्द्रमाका है।' इतना सुनते ही राजा सोमने उस बालकको गोदमें उठा लिया और उसका मस्तक सूँघकर बुध नाम रखा। यह बालक बड़ा बुद्धिमान् था। बुध आकाशमें चन्द्रमासे प्रतिकूल दिशामें उदित होते हैं।

मुनिवरो! बुधके पुत्र पुरूरवा हुए, जो बड़े विद्वान्, तेजस्वी, दानशील, यज्ञकर्ता तथा अधिक दक्षिणा देनेवाले थे। वे ब्रह्मवादी, पराक्रमी तथा शत्रुओंके लिये दुर्धर्ष थे। निरन्तर अग्निहोत्र करते और यज्ञोंके अनुष्ठानमें संलग्न रहते थे। सत्य बोलते और बुद्धिको पवित्र रखते थे। तीनों लोकोंमें उनके समान यशस्वी दूसरा कोई नहीं था। वे ब्रह्मवादी, शान्त, धर्मज्ञ तथा सत्यवादी थे। इसीलिये यशस्विनी उर्वशीने मान छोड़कर उनका वरण किया। राजा पुरूरवा उर्वशीके साथ पवित्र स्थानोंमें उनसठ वर्षोतक विहार करते रहे। उन्होंने महर्षियोंद्वारा प्रशंसित प्रयागमें राज्य किया। उनका ऐसा ही प्रभाव था। पुरूरवाके सात पुत्र हुए, जो गन्धर्वलोकमें प्रसिद्ध और देवकुमारोंके समान सुन्दर थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—आयु, अमावसु, विश्वायु, धर्मात्मा श्रुतायु, दृढायु, वनायु तथा बह्रायु—ये सब उर्वशीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। अमावसुके पुत्र राजा भीम हुए। भीमके पुत्र काञ्चनप्रभ और उनके पुत्र महाबली सुहोत्र हुए। सुहोत्रके पुत्रका नाम जह्नु था, जो केशिनीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। उन्होंने सर्पमेध नामक महान् यज्ञका अनुष्ठान किया। एक बार गङ्गा उन्हें पति बनानेके लोभसे उनके पास गयीं, किन्तु उन्होंने अनिच्छा प्रकट कर दी। तब गङ्गाने उनकी यज्ञशाला बहा दी। यह देख जह्नुने क्रोधमें भरकर कहा—'गङ्गे! मैं तेरा जल पीकर तेरे इस प्रयत्नको अभी व्यर्थ किये देता हूँ। तू अपने इस घमण्डका फल शीघ्र पा ले।' यों कहकर उन्होंने गङ्गाको पी लिया। यह देख महर्षियोंने बड़ी अनुनय करके गङ्गाको जह्नुकी पुत्रीके रूपमें प्राप्त किया, तबसे वे जाह्नवी कहलाने लगीं। तत्पश्चात् जह्नुने युवनाश्वकी पुत्री कावेरीके साथ विवाह किया। युवनाश्वके शापवश गङ्गा अपने आधे स्वरूपसे सरिताओंमें श्रेष्ठ कावेरीमें मिल गयी थीं। जह्नुने कावेरीके गर्भसे सुनद्य नामक धार्मिक पुत्रको जन्म दिया। सुनद्यके पुत्र अजक, अजकके बलाकाश्व और बलाकाश्वके पुत्र कुश हुए। कुशके देवताओंके समान तेजस्वी