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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished434 pages

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Page 29

* चन्द्रवंशके अन्तर्गत जह्नु, कुशिक तथा भृगुवंशका संक्षिप्त वर्णन * २७

नाम दिलीप हुआ, जो भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके प्रपितामह थे। दिलीपके पुत्र महाबाहु रघु हुए, जो अयोध्याके महाबली सम्राट् थे। रघुके अज और अजके पुत्र दशरथ हुए। दशरथसे महायशस्वी धर्मात्मा श्रीरामका प्रादुर्भाव हुआ। श्रीरामचन्द्रजीके पुत्र कुशके नामसे विख्यात हुए। कुशसे अतिथिका जन्म हुआ, जो बड़े यशस्वी और धर्मात्मा थे। अतिथिके पुत्र महापराक्रमी निषध थे। निषधके नल और नलके नभ हुए। नभके पुण्डरीक और पुण्डरीकके क्षेमधन्वा हुए। क्षेमधन्वाके पुत्र महाप्रतापी देवानीक थे। देवानीकसे अहीनगु, अहीनगुसे सुधन्वा, सुधन्वासे राजा शल, शलसे धर्मात्मा उक्य, उक्यसे वज्रनाभ और वज्रनाभसे नलका जन्म हुआ। मुनिवरो! पुराणमें दो ही नल प्रसिद्ध हैं—एक तो चन्द्रवंशीय वीरसेनके पुत्र थे और दूसरे इक्ष्वाकुवंशके धुरंधर वीर थे। इक्ष्वाकुवंशके मुख्य-मुख्य पुरुषोंके नाम बताये गये। ये सूर्यवंशके अत्यन्त तेजस्वी राजा थे। अदितिनन्दन सूर्यकी तथा प्रजाओंके पोषक श्राद्धदेव मनुकी इस सृष्टि-परम्पराका पाठ करनेवाला मनुष्य संतानवान् होता और सूर्यका सायुज्य प्राप्त करता है।

चन्द्रवंशके अन्तर्गत जह्नु, कुशिक तथा भृगुवंशका संक्षिप्त वर्णन

लोमहर्षणजी कहते हैं—पूर्वकालमें जब ब्रह्माजी सृष्टिका विस्तार करना चाहते थे, उस समय उनके मनसे महर्षि अत्रिका प्रादुर्भाव हुआ, जो चन्द्रमाके पिता थे। सुननेमें आया है कि अत्रिने तीन हजार दिव्य वर्षोंतक अनुत्तर नामकी तपस्या की थी, उसमें उनका वीर्य ऊर्ध्वगामी हो गया था। वही चन्द्रमाके रूपमें प्रकट हुआ। महर्षिका वह तेज ऊर्ध्वगामी होनेपर उनके नेत्रोंसे जलके रूपमें गिरा और दसों दिशाओंको प्रकाशित करने लगा। चन्द्रमाको गिरा देख लोकपितामह ब्रह्माजीने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे उसे रथपर बिठाया। अत्रिके पुत्र महात्मा सोमके गिरनेपर ब्रह्माजीके पुत्र तथा अन्य महर्षि उनकी स्तुति करने लगे। स्तुति करनेपर उन्होंने अपना तेज समस्त लोकोंकी पुष्टिके लिये सब ओर फैला दिया। चन्द्रमाने उस श्रेष्ठ रथपर बैठकर समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीकी इक्कीस बार परिक्रमा की। उस समय उनका जो तेज चूकर पृथ्वीपर गिरा, उससे सब प्रकारके अन्न आदि उत्पन्न हुए, जिनसे यह जगत् जीवन धारण करता है। इस प्रकार महर्षियोंके स्तवनसे तेजको पाकर महाभाग चन्द्रमाने बहुत वर्षोंतक तपस्या की; उससे संतुष्ट होकर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजीने उन्हें बीज, ओषधि, जल तथा ब्राह्मणोंका राजा बना दिया। मृदुल स्वभाववालोंमें सबसे श्रेष्ठ सोमने वह विशाल राज्य पाकर राजसूय-यज्ञका