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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished434 pages

Page 261 of 434

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Page 261

* भद्रतीर्थ, पतत्रीतीर्थ और विप्रतीर्थकी महिमा * २५९

ब्राह्मणकी बात सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसीने बुड्डी होनेपर भी मनोहर रूप धारण किया और दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो ब्राह्मणको अपने साथ ले इधर-उधर घूमने लगी। वह सर्वत्र यही कहती कि 'यह मेरा पुत्र गुणाकर है।' ब्राह्मणकुमार रूप, सौभाग्य, वय और विद्यासे विभूषित थे और यह वृद्धा भी गुणवती दिखायी देती थी; अतः सब लोग उसे ब्राह्मणकी माता ही समझते थे। वहाँ किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणने वस्त्राभूषणोंसे विभूषित अपनी सुन्दरी कन्या उस राक्षसीको आगे करके आसन्दिवको ब्याह दी। ऐसे सुयोग्य पतिको पाकर कन्याने अपनेको कृतार्थ माना। किंतु वे ब्राह्मण अपनी गुणवती पत्नीको देखकर बहुत दुःखी हुए। उन्होंने मन-ही-मन सोचा—'यह पापिनी राक्षसी एक दिन मुझे खा ही जायगी। क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? अथवा किससे यह बात कहूँ? मैं भारी संकटमें पड़ा हूँ। कौन यहाँ मेरी रक्षा करेगा? मेरी यह कल्याणमयी पत्नी गुणवती, रूपवती और नयी अवस्थाकी है। इसे भी वह राक्षसी अकस्मात् अपना आहार बना लेगी।'

इसी बीचमें वह बुढ़िया कहीं चली गयी। उस समय अपने पतिको दुःखित जानकर ब्राह्मणकी पतिव्रता पत्नीने एकान्तमें विनीत भावसे पूछा—'नाथ! आप क्यों कष्टमें पड़े हैं? ठीक-ठीक बताइये।' 'ब्राह्मणने सब बातें विस्तारके साथ बता दीं। प्रिय मित्र और कुलीन पत्नीसे कौन-सी बात अकथनीय है। पतिकी बात सुनकर स्त्रीने कहा—'प्राणनाथ! जिसका मन अपने वशमें नहीं है, उसको तो सब ओर भय है। वह घरमें भी निर्भय नहीं है। परंतु जिन्होंने अपने आत्मापर अधिकार प्राप्त कर लिया है, उन्हें किससे भय है? वह भी गौतमी-तटपर, जहाँ कितने ही वैष्णव, विरक्त और विवेकी पुरुष निवास करते हैं। यहाँ स्नान करके पवित्र हो भगवान् नारायणकी स्तुति कीजिये।' यह सुनकर ब्राह्मणने गङ्गामें स्नान किया और गौतमीके तटपर भगवान् नारायणका स्तवन आरम्भ किया—'नाथ ! आप इस जगत्‌के अन्तरात्मा हैं। मुकुन्द! आप ही इसकी सृष्टि और संहार करनेवाले हैं। अनाथबन्धु नृसिंह! आप ही सबके पालक हैं। मुझ दीनकी रक्षा क्यों नहीं करते?' यह प्रार्थना सुनकर संसारका शोक दूर करनेवाले भगवान् नारायणने सहस्र अरोंवाले तेजोमय सुदर्शनचक्रसे उस पापिनी राक्षसीको मार डाला और उस ब्राह्मणको अभीष्ट वरदान दे उसे माता-पिताके पास पहुँचा दिया। तबसे वह स्थान विप्रतीर्थ और नारायणतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वहाँ स्नान, दान और पूजा आदि करनेसे मनोवाञ्छित फलकी सिद्धि होती है।

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