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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished434 pages

Page 259 of 434

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Page 259
  • भद्रतीर्थ, पतत्रितीर्थ और विप्रतीर्थकी महिमा * २५७

गतियोंका पूर्णरूपसे निरूपण किया। वे बोले—'जो मनुष्य विहित कर्मका कभी उल्लङ्घन नहीं करते, उन्हें नरक नहीं देखना पड़ता। जो शास्त्र और शास्त्रीय सदाचारको नहीं मानते, बहुश्रुत विद्वानोंका आदर नहीं करते और विहित कर्मोंका उल्लङ्घन करते हैं, वे मनुष्य नरकगामी होते हैं।* धर्मराजका यह वचन सुनकर हर्षणने पुनः कहा—'सुरश्रेष्ठ! मेरे पिता विश्वरूप बड़े भयंकर हैं। मेरी माता विष्टि भी भयानक ही हैं। मेरे महाबली भ्राता भी वैसे ही हैं। जिस उपायसे उन लोगोंकी बुद्धि शान्त हो, वे सुरूप, निर्दोष और मङ्गलदायक हो जायँ, वह मुझे बताइये। मैं उसे करूँगा, अन्यथा मैं उनके पास लौटकर नहीं जाऊँगा।' हर्षणके यों कहनेपर धर्मराजने उस शुद्ध बुद्धिवाले बालकसे कहा—'हर्षण! तुम वास्तवमें हर्षण ही हो। पुत्र तो बहुत-से होते हैं, किंतु वे सभी कुलका विस्तार करनेवाले नहीं होते। एक ही कोई ऐसा पुत्र होता है, जो समूचे कुलको धारण करता है। जो कुलका आधारभूत, पिता-माताका प्रियकारक और पूर्वजोंका उद्धार करनेवाला है, वही वास्तवमें पुत्र है; अन्य जितने हैं, वे रोग हैं। हर्षण! तुमने मेरे मनके अनुकूल बात कही है। यह तुम्हारे नाना भगवान् सूर्यको भी पसंद आयेगी। अतः तुम गौतमी-तटपर जाओ और वहाँ स्नान करके मनको वशमें रखते हुए प्रसन्नचित्तसे जगद्योनि शान्तस्वरूप भगवान् विष्णुकी स्तुति करो। वे यदि प्रसन्न हो जायँ तो तुम्हारे समस्त मनोरथोंको पूर्ण कर देंगे।'

यह सुनकर हर्षण गौतमी-तटपर गया और स्नान आदिसे पवित्र हो देवेश्वर भगवान् विष्णुकी स्तुति करने लगा। इससे प्रसन्न होकर श्रीहरिने हर्षणको वरदान दिया—'तुम्हारे कुलका कल्याण हो। समस्त अभद्रों (अमङ्गलों)-की शान्ति होकर भद्र (मङ्गल)-का विस्तार हो।' 'भद्रम् अस्तु' कहनेसे हर्षणके पिता भद्र कहलाये और माता विष्टिका नाम भद्रा हुआ। तबसे वह स्थान भद्रतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह सब प्रकारसे मङ्गलदायक तथा तीर्थसेवी पुरुषोंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। वहाँ भद्रपतिके नामसे प्रसिद्ध होकर साक्षात् देवाधिदेव भगवान् जनार्दन श्रीहरि निवास करते हैं, जो मङ्गलके एकमात्र भण्डार हैं।

पतत्रितीर्थ रोगों तथा पापोंका नाश करनेवाला है। उसके स्मरणमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। कश्यपके दो पुत्र हुए—अरुण और गरुड़। उनके कुलमें पक्षियोंमें श्रेष्ठ सम्पाति उत्पन्न हुए। सम्पातिके छोटे भाईका नाम जटायु था। वे दोनों अपने बलसे उन्मत्त और एक-दूसरेसे लाग-डाँट रखनेवाले थे। एक दिन वे दोनों भगवान् सूर्यको नमस्कार करनेके लिये आकाशमें गये। ज्यों ही सूर्यके समीप पहुँचे, दोनोंके पंख जल गये और दोनों थककर पर्वतके शिखरपर गिर पड़े। दोनों भाइयोंको निश्चेष्ट एवं अचेत होकर गिरा देख अरुण उनके दुःखसे दुःखी हो गये और भगवान् सूर्यसे बोले—'भगवन्! ये दोनों पक्षी पृथ्वीपर गिर पड़े हैं। इन्हें आश्वासन दें, जिससे इनकी मृत्यु न हो।' 'तथास्तु' कहकर सूर्यने उनको जीवित कर दिया। गरुड़ भी उनकी अवस्था सुनकर भगवान् विष्णुके साथ वहाँ आये और उन्हें सान्त्वना देकर सुख पहुँचाया। तदनन्तर सब लोग अपने संतापका निवारण करनेके लिये गङ्गातटपर गये। जटायु, अरुण, सम्पाति, गरुड़, सूर्य तथा भगवान् विष्णु—सबने उस प्रचुर


* न मानयन्ति ये शास्त्रं नाचारं न बहुश्रुतान्। विहितातिक्रमं कुर्युर्ये ते नरकगामिनः॥
(१६५।३६)