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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished434 pages

Page 253 of 434

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Page 253

* सारस्वत तथा चिच्चिकतीर्थका माहात्म्य * २५१

अन्नको अतिथिके लिये दे देता है, उसने मानो पृथ्वीका दान कर दिया।'^१

यह सुनकर शाकल्यने कहा—'मैं तुम्हें भोजन देता हूँ।' यों कहकर उन्होंने उसे आसनपर बिठाया और विधिवत् पूजा करके भोजन परोसा। परशुने हाथमें आचमनके लिये जल लेकर कहा—'दूरसे थके-माँदे आये हुए अतिथिके पीछे देवता भी आते हैं। जब अतिथि तृप्त होता है, तब वे भी तृप्त हो जाते हैं। यदि अतिथिकी तृप्ति न हुई तो वे भी अतृप्त रह जाते हैं। अतिथि और निन्दक—ये दोनों विश्वके बन्धु हैं। निन्दक तो पाप हर लेता है और अतिथि स्वर्गकी सीढ़ी बन जाता है। जो मार्गसे थककर आये हुए अतिथिको अवहेलनापूर्वक देखता है, उसके धर्म, यश और लक्ष्मीका तत्काल नाश हो जाता है।^२ इसलिये मैं थका-माँदा अभ्यागत आपसे कुछ याचना करता हूँ। आप मुझे अभीष्ट वस्तु देंगे, तभी भोजन करूँगा; अन्यथा नहीं।' शाकल्यने कहा—'उसे दिया हुआ ही समझो। तुम निश्चिन्त होकर भोजन करो।' तब राक्षसोंमें श्रेष्ठ परशुने कहा—'मुने! मैं पके बालोंवाला दुर्बल एवं बूढ़ा ब्राह्मण नहीं, तुम्हारा शत्रु हूँ। तुम्हें मारकर खा जानेका अवसर देखते-देखते मेरे कितने वर्ष व्यतीत हो गये। जैसे थोड़ा जल गर्मीमें सूख जाता है, वैसे ही मेरे सब अङ्ग भूखके मारे सूख रहे हैं। अतः मैं तुम्हारे अनुचरोंसहित तुम्हें ले चलूँगा और अपना आहार बनाऊँगा।'

परशुका यह कथन सुनकर शाकल्यने कहा—'जो उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए हैं और जिन्हें सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञान है, उनकी की हुई प्रतिज्ञा कभी झूठी नहीं होती। अतः सखे! तुम्हें जैसा उचित जान पड़े, करो। तथापि मेरी एक बात सुन लो; क्योंकि श्रेष्ठ पुरुषोंका कर्तव्य है कि जो मारनेको उद्यत हों, उनसे भी हितकी ही बात कहे। यह बात ध्यानमें रखो कि मैं ब्राह्मण हूँ। मेरा शरीर वज्रके समान कठोर है और भगवान् श्रीहरि मेरी सब ओरसे रक्षा करते हैं। भगवान् विष्णु मेरे पैरोंकी रक्षा करें। देव जनार्दन मेरे मस्तककी, भगवान् वाराह दोनों भुजाओंकी, कूर्मराज पृष्ठभागकी, कृष्ण हृदयकी, नृसिंहजी अँगुलियोंकी, वाणीके अधीश्वर मुखकी, गरुडवाहन नेत्रोंकी, धनेश दोनों कानोंकी और भगवान् भव सब ओरसे मेरे शरीरकी रक्षा करें। नाना प्रकारकी आपत्तियोंमें एकमात्र साक्षात् भगवान् नारायण ही मेरे लिये शरण हैं।'

यों कहकर शाकल्यने कहा—'राक्षसराज! अब तुम्हारी इच्छा हो तो इस समय आलस्य छोड़कर मुझे यहाँसे उठा ले चलो या यहीं सुखपूर्वक खा जाओ।' उनके यों कहनेपर भी वह राक्षस खानेको तैयार हो गया। सच है, पापीके हृदयमें करुणाका एक कण भी नहीं होता। बड़ी-बड़ी दाढ़ें और विकराल मुख बनाये जब वह ब्राह्मणके समीप पहुँचा, तब उन्हें देखकर बोला—'विप्रवर! तुमको तो शङ्ख, चक्र


१. त एव धन्या लोकेऽस्मिन् येषामतिथयो गृहात्। पूर्णाभिलाषा निर्यान्ति जीवन्तोऽपि मृताः परे॥
भोजने तूपविष्टे तु आत्मार्थं कल्पितं तु यत्। अतिथिभ्यस्तु यो दद्याद्दत्ता तेन वसुंधरा॥
(१६३।१५-१६)

२. अतिथिश्चापवादी च द्वावेतौ विश्वबान्धवौ। अपवादी हरेत्पापमतिथिः स्वर्गसंक्रमः॥
अभ्यागतं पथि श्रान्तं सावज्ञं योऽभिवीक्षते। तत्क्षणादेव नश्यन्ति तस्य धर्मयशःश्रियः॥
(१६३।२०-२१)