संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
by महर्षि वेदव्यास
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कोई भी कार्य सिद्ध न हो सकेगा। पुत्रका यह निश्चय जानकर राजाने अमात्योंको बुलाया और उसके विवाहके लिये इस प्रकार कहा—'मेरा पुत्र युवराज नागेश्वर सब गुणोंकी खान है। वह बुद्धिमान, शूर, दुर्जय तथा शत्रुओंको संताप देनेवाला है। उसका विवाह करना है। मैं बूढ़ा हुआ। अब पुत्रको राज्यका भार सौंपकर निश्चिन्त होना चाहता हूँ। आपलोग मेरे हित-साधनमें तत्पर हो उसके विवाहके लिय प्रयत्न करें।'
राजाकी बात सुनकर अमात्यगण हाथ जोड़कर बोले—'महाराज ! आपके पुत्र सब गुणोंमें श्रेष्ठ हैं और आप भी सर्वत्र विख्यात हैं। फिर आपके पुत्रका विवाह करनेके लिये क्या मन्त्रणा करनी है और किस बातकी चिन्ता।' अमात्योंके यों कहनेपर नृपश्रेष्ठ शूरसेन कुछ गम्भीर हो गये। वे उन अमात्योंको यह बताना नहीं चाहते थे कि मेरा बेटा सर्प है; तथा वे भी इस बातसे अपरिचित ही रहे। राजाने फिर कहा—'कौन कन्या गुणोंमें सबसे अधिक है तथा कौन राजा ऊँचे कुलमें उत्पन्न, श्रीमान् और उत्तम गुणोंके आश्रय हैं?' राजाका यह कथन सुनकर अमात्योंमेंसे एक परम बुद्धिमान् पुरुष, जो महाराजके संकेतको समझनेवाले थे, उनका विचार जानकर बोले—'महाराज! पूर्वदेशमें विजय नामके एक राजा हैं। उनके पास घोड़े, हाथी और रत्नोंकी गिनती नहीं है। महाराज विजयके आठ पुत्र हैं, जो बड़े धनुर्धर हैं। उनकी बहिन भोगवती साक्षात् लक्ष्मीके समान है। राजन्! वह आपके पुत्रके लिये सुयोग्य पत्नी होगी।'
बूढ़े अमात्यकी बात सुनकर राजाने उत्तर दिया—'राजा विजयकी वह कन्या मेरे पुत्रके लिये कैसे प्राप्त हो सकती है, बताओ।'
बूढ़े अमात्यने कहा—'महाराज! आपके मनमें जो बात है, मैं उसे समझ गया। अब आप मुझे कार्य-सिद्धिके लिये जानेकी आज्ञा दें।' महाराज शूरसेनने भूषण, वस्त्र तथा मधुर वाणीसे बूढ़े मन्त्रीका सत्कार करके उन्हें बहुत बड़ी सेनाके साथ भेजा। वे पूर्वदेशमें जाकर महाराज विजयसे मिले और नाना प्रकारके वचनों तथा नीतिजनित उपायोंसे राजाको संतुष्ट किया। मन्त्रीने राजकुमारी भोगवती और युवराज नागका विवाह तय करा दिया। राजा विजयने कन्या देना स्वीकार कर लिया। बूढ़े मन्त्री लौट आये और शूरसेनसे उन्होंने विवाह निश्चित होनेका सब वृत्तान्त सुना दिया। तदनन्तर बहुत समय व्यतीत हो जानेपर वृद्ध मन्त्री अन्य सब सचिवोंको साथ लेकर सहसा राजा विजयके वहाँ पहुँचे और इस प्रकार बोले—'राजन्! महाराज शूरसेनके राजकुमार नाग बड़े ही बुद्धिमान् और गुणोंके समुद्र हैं। वे स्वयं यहाँ आना नहीं चाहते। क्षत्रियोंके विवाह अनेक प्रकारसे होते हैं। अतः यह विवाह शस्त्रों द्वारा हो जाय तो अच्छा है।'
वृद्ध मन्त्रीकी बात सुनकर राजा विजयने उसे सत्य ही माना और भोगवतीका विवाह शस्त्रके साथ ही शास्त्र-विधिके अनुसार सम्पन्न हुआ। विवाहके पश्चात् महाराजने बड़े हर्षके साथ बहुत-सी गौएँ, सुवर्ण और अश्व आदि सामग्री दहेजमें देकर कन्याको विदा किया। साथ ही अपने अमात्योंको भी भेजा। बूढ़े मन्त्री आदि सचिवोंने प्रतिष्ठानमें आकर महाराज शूरसेनको उनकी पुत्रवधू समर्पित कर दी। राजा विजयने जो विनयपूर्ण वचन कहे थे, उनको भी सुनाया और उनकी दी हुई दहेजकी सामग्री—विचित्र आभूषण, दासियाँ तथा वस्त्र आदि निवेदन किये। इन सब कार्योंका सम्पादन करके वे लोग कृतकृत्य हो गये। राजकुमारी भोगवतीके साथ