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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

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जिस प्रकार हीरे का सौन्दर्य सफल खराद करने वाले के हाथों में जाकर
प्रस्फुटित होता है उसी प्रकार काव्य भी छन्दों के प्रयोग से निखर उठता है ।
यद्यपि कवि छन्दों का मुखापेक्षी नहीं होता और न वह यति गति के नियमों से
ही बँधा होता है फिर भी भावों की मधुरिमा के लिये लय की आवश्यकता होती
है जो वर्णों और मात्राओं की योजना पर निर्भर करती है । अतः छन्दों के मुखा-
पेक्षी न रहने पर भी अदृश्य रूप से ये ही व्यञ्जना सिद्धि में प्रेरक हैं इसे स्वीकार
करना ही पड़ेगा । छन्दों का चुनाव वर्ण्य विषय और भाषा को दृष्टिगत रख कर
ही होना चाहिए । आज तक के प्रकाशित ग्रन्थों को देखने से ऐसा प्रतीत होता
है कि न तो प्रत्येक छन्द हर प्रकार के वर्णन के लिये उपयुक्त होता है और
न प्रत्येक भाषा में ही प्रत्येक छन्द का सफल प्रयोग हो पाता है । 'अवधी' में
जितनी सफलता दोहा और चौपाई को मिली उतनी सफलता ब्रजभाषा में इन्हें
नहीं प्राप्त हुई । ब्रजभाषा के सफल छन्द तो कवित्त और सवैया ही थे । इसी
प्रकार नीति और उपदेशात्मक विषयों की व्यञ्जना में दोहा छन्द जितना सफल
रहा उतना अन्य छन्द नहीं । यह ठीक है कि छन्द शास्त्रियों ने ऐसा कोई विधान
नहीं बनाया कि अमुक विषय अथवा अमुक भाषा के लिये अमुक छन्द का ही
प्रयोग होना चाहिये फिर भी प्रकाशित रचनाओं की सफलता और विफलता को
दृष्टिगत रखते हुए उपर्युक्त निष्कर्ष निकाला जा सकता है ।
बीसलदेव रासो के छन्दों का निर्णय करते समय हमें उपर्युक्त सभी बातों
को ध्यान में रखना आवश्यक है । इस रासो का विषय शृङ्गार रस सिक्त है और
इसकी भाषा डिंगल है, यद्यपि भाषा की अस्तव्यस्तता और डिंगल व्याकरण
के नियमों की अवहेलना को देखते हुए ऐसा कहना निर्मूल न होगा । हाँ, इसकी
भाषा को नागर अपभ्रंश और साहित्यिक डिंगल का मिश्रण कहने में सम्भवतः
कोई अत्युक्ति नहीं होगी । अस्तु, ऐसी भाषा और इस ग्रन्थ के वर्ण्य विषय के
लिये कौन-सा छन्द उपयुक्त हो सकता था यह विचारणीय है ।
यों तो दसवीं से लेकर बारहवीं शताब्दी तक के राजस्थानी काव्य में सबसे
अधिक प्रयोग दोहा और छप्पय छन्दों का हुआ है जिसका कारण इसके काव्य में
वीर रस की प्रधानता है फिर भी इनके अतिरिक्त मन्दाक्रान्ता, शुभादाम, सु० ग०
प्रभात, पद्धरी, तोमर और गीत छन्दों का प्रयोग भी बहुत हुआ है—गीत छन्द
डिंगल साहित्य में अपनी विशेषता रखता है । डिंगल रीति-ग्रन्थों में इसके ८५
प्रकारों के लक्षण उदाहरण सहित मिलते हैं ।¹
१. रघुवर जसप्रकाश ।