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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

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Page 94

किया गया है क्योंकि वैदिक छन्दों में वर्णवृत्त की प्रधानता यहाँ तक विशेष थी
कि १०४ अक्षरों तक के छन्द निर्मित होते थे । वर्ण और मात्रा की खिचड़ी
संस्कृत काल के छन्दों में भी पकती रही ! छन्दों में वर्णिक और मात्रिक
का भेद तब स्पष्ट रूप से स्थापित हुआ जब वैदिक छन्द, वर्ग विशेष का साहित्य
बन गया और जनता से उसका सम्पर्क छूट गया । जनता ने यद्यपि अपना
सम्बन्ध-विच्छेद वैदिक और संस्कृत छन्दों से कर लिया फिर भी उनमें छान्द-
सिक संस्कार वैदिक और सांस्कृतिक ही थे । अतः जिस लय में वर्ण पर स्वराघात
देकर या उदात्त उच्चारण से छन्द पूरा किया जाता था जनता ने उस स्थान पर
एक मात्रा का योग करके उस लय को पूरा किया । लय को पूर्ण करने के लिये
मात्राओं के योग की यह जनपदीय पद्धति ही धीरे धीरे अपने अलग स्वरूप में
विकसित होने लगी । प्राकृतकाल के आगमन तक यह इतनी लोकप्रिय हो गई
कि इस काल के छन्द प्रारम्भ काल से ही मात्रावृत्त होने लगे । मात्रावृत्त छन्दों
के विकसित होने तथा जनता द्वारा अपनाये जाने के प्रधानतः दो कारण थे ।
प्रथमतः जन गीतों के चरण बहुत छोटे होते हैं जिनमें मात्रावृत्त छन्दों का ही
सफल प्रयोग सम्भव होता है । द्वितीयतः मात्रावृत्त छन्दों में कवि को स्वच्छन्दता
का अवसर रहता है जो वर्णवृत्त छन्दों में अपेक्षाकृत कम प्राप्त होता है । मात्रा-
वृत्त छन्द जनता के आदर के पात्र इसलिए भी बन गये कि इसमें संगीत के
उपयुक्त गुण भी वर्तमान थे । गीत में ताल का निशान प्रधान होता है जो कि
मात्राओं पर निर्भर होता है, वर्णों पर नहीं ।
मात्रिक छन्द अपनी उपर्युक्त विशेषताओं और सुविधाओं के कारण इतना
विशेष लोकप्रिय बन गया कि प्राकृतों के साहित्यिक रूप धारण करने पर जहाँ
मध्यकाल की प्राकृत रचनायें संगीत विहीन हो गयीं वहीं अपभ्रंश में जनता द्वारा
अपनाये जाने वाले मात्रिक छन्द इतने प्रचलित हुए कि इन छन्दों में आद्यो-
पान्त महाकाव्यों की रचना होने लगी । चौरासी सिद्धों और जैनाचार्यों की
कृतियों का सृजन, जो प्रायः नवीं शताब्दी के बाद हुआ, मात्रिक छन्दों में ही
हुआ । इन छन्दों का प्रचार उत्तरोत्तर इतना अधिक हुआ कि संस्कृत के कवि
गोवर्द्धनाचार्य तथा जयदेव ने भी अपनी कृतियों की रचना वर्ण-वृत्तों में न कर
मात्रिक छन्दों में की । मात्रिक छन्दों में भी 'पद्धटिका' छन्द का प्रयोग
बहुशः अपभ्रंश काव्य में पाया जाता है । इस छन्द में ८ मात्राओं के बाद
स्वभावतः ही ताल लगने के कारण संगीत के लिये यह विशेष रूप से उपयोगी
होता है । सङ्गीतोपयोगी छन्द पद्धटिका के समान ही नृत्योपयोगी 'घत्ता' और