बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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विरह में राजमती का शरीर क्षीण हो गया है, और उसे माघ मास में तुषार-
पात के कारण दग्ध वनखण्ड को देखकर संसार दग्ध हुआ दिखाई पड़ता है।
देखिये, यह कहती है :-
"माह मास इसीय पड़इ ठंडार ।
दाधा छइ वनषण्ड कीधा हो छार ।
आप दहंती जग दहाउ ।
म्हा की चोली य मांहि थी दाधउ छइ गात्र ।
घणीय विहुणी गण तांकिजइ ।
तूँ तउ छयड्ढाउ रे भाविउयो करह पलाणी
जोवन छत्र उमाहियउ ।
म्हाकी कनक काया माहे फेरथी आण ।"
रानी राजमती को माघ की तरह वर्ष का प्रत्येक मास पीड़ा पहुँचाता है और
वह विरहाग्नि में जल जल कर छटपटाती है। अन्त में वह ईश्वर से मर्म भरी
प्रार्थना करती है। वह 'उलगणा की नारी' (प्रवासी की पत्नी) को छोड़कर
और जिसका भी चाहे सृजन करें। देखिये कसक, व्यथा और दर्द भरा उसका
उलाहना-
"अजी जनम काइ दीयउ रे महेस ।
अवर जनम थारइ घणा रे नरेस ।
वनिन सिरजी रोझणी ।
घणहन सिरजी धवलीय गाइ ।
वनिहन सिरजी कोइली ।
हस बइमती आघा नइ चम्पा की डाल ।
भंपती दाप बिजोरणी ।
सइतउ काइ सिरजो उलगाणा की नारि ॥"
कवि नल्ह का प्रस्तुत षड्ऋतु-वर्णन न तो कवि जायसी के पद्मावत के
'षड्ऋतु-वर्णन और नागमती वियोग खण्ड' के लम्बे-चौड़े वर्णन के समान
ईश्वर से मिलन और उनके वियोग के मिस है, न भक्तप्रवर तुलसी के मानस के
किष्किन्धा काण्ड के पावस और शरद् के वर्णन की भाँति नीति और भक्ति का
उपदेशक, और न रीतिकालीन कवियों की तरह शब्दालंकारो तथा अर्थालंकारों के
घटाटोप में मन और बुद्धि को कुछ क्षणों के लिए आच्छादित करने वाला, वरन्