बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
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Read in contextमत का खण्डन श्री अगरचन्द जी नाहटा¹ तथा डा० उदयनारायण जी तिवारी²
ने यह कह कर दिया है कि ग्रन्थ में उसे व्यास या जोइसी लिखा गया है।
राजपूताने में ये दोनों जातियाँ ब्राह्मण वर्ग के अन्तर्गत हैं। हमें नाहड़ ब्राह्मण
ही जान पड़ता है। ग्रन्थ की प्राप्य प्राचीनतम प्रति सं० १६३३ में इसो शब्द का
उल्लेख पद्य संख्या ५१, २४५ आदि कई पदों में है।³ यह शब्द संस्कृत शब्द
'ज्योति' का अपभ्रंश है । ज्योतिषी किस जाति के होते थे इस सम्बन्ध में सर
एथेल्स्टन बेन्स का मत है कि "ज्योतिषी चूँकि ब्राह्मण जाति के ही होते हैं इस-
लिये जनगणना के समय इनकी पृथक् गणना नहीं होती है। ये राजाओं और महा-
राजाओं द्वारा सर्वदा सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं तथा इनके जीवन-यापन
का प्रबन्ध भी इन्हीं राजाओं और महारानाओं द्वारा राज्य की ओर से होता है ।
इनका कार्य जन्मपत्री बनाना और गार्हस्थ्य जीवन-सम्बन्धी प्रत्येक कार्य के
लिये शुभ मुहूर्त आदि बताना होता है। इनके अतिरिक्त ज्योतिषियों का एक
वर्ग और होता है जो 'जोशी' कहलाता है। ये अपना जीवननिर्वाह हाथरेखा
और भाग्यरेखा की गणना, दुष्ट ग्रहों के लिये प्राप्त दान तथा ग्रहण आदि के
अवसर पर प्राप्त दान से करते हैं। गणना के समय इनका पृथक् उल्लेख यही
सिद्ध करता है कि ये किसी जातिविशेष के नहीं होते हैं। इस वर्ग का निर्माण
कई जातियों के मिश्रण के फलस्वरूप हुआ है।
सर बेन्स द्वारा दी गयी ज्योतिषियों की जाति की उपर्युक्त कसौटी पर यदि
नाहड़ की जाति को कसा जाय तो यह स्पष्ट सिद्ध होगा कि वह ब्राह्मण था।
जोइसी शब्द के उल्लेख से तो उसका ब्राह्मण होना स्पष्ट है ही इसके अतिरिक्त
भी उसके काव्य में आयी हुई निम्न पंक्तियाँ यही सिद्ध करती हैं कि वह ज्योतिष
विद्या का ज्ञाता था। काव्य प्रारम्भ करते ही वह कहता है कि
आणि करि रोहणी जिमि तपइ सुरि ।
अवग नइ घेपउरे रथि तपइ ॥१॥
१—राजस्थानी—भाग ३, अंक २—पृ० ११ ।
२—वीर काव्य—पृ० १८० ।
३—रोहनी नक्षत्र सोहामयउ ।
सो दिन गिखि जोइसी जोडइ रास ॥
"सुदिन देई म्हाका जोइसी ।
फाड़ि पतइउ अरू बोलिमइ साची।”