बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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क्योंकि प्रचलित होने के कारण ही इस नाम का उपयोग एक स्थान से अधिक
स्थानों में किया गया है और नरपति कवि का उपनाम इसलिये प्रतीत होता है
कि इसका प्रयोग केवल एक स्थान पर हुआ है और वह भी हुआ केवल तुक
के मेल के लिये ही ।
कवि का नरपति नाम 'उपनाम' कतिपय विद्वानों में यह भ्रम उत्पन्न किये
हुए है कि कवि कोई राजा था ।¹ ऐसे भ्रम का कारण केवल एक यही हो सकता
है कि नरपति का शाब्दिक अर्थ राजा होता है । लेकिन जैसा कि ऊपर कहा जा
चुका है कि इस शब्द का प्रयोग प्राप्त प्रतियों में प्राचीनतम प्रति में केवल एक
स्थान पर हुआ है और उस स्थान पर इसका अर्थ कदापि राजा नहीं हो सकता,
इसलिये इस शब्द का अर्थ राजा लगाकर नाल्ह और नरपति को दो विभिन्न
व्यक्ति मानना उचित न होगा । लेकिन यदि किसी कारणवश नरपति का अर्थ
राजा लगाना ही, विद्वानों द्वारा उचित समझा जाय तब भी श्रेयस्कर यही होगा
कि नाल्ह और नरपति को दो विभिन्न व्यक्ति न मानकर नरपति को नाल्ह की
उपाधि समझी जाय, जो बहुत कुछ सम्भव है कि उसे प्राप्त हुई होगी उसके गुणों
के कारण । और यों भी कवि नरपुंगव तो होते ही हैं ।
कवि की जाति
कवि के नाम की तरह कवि की जाति के सम्बन्ध में भी विद्वानों के विभिन्न
मत हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के मतानुसार कवि भाट जाति का था ।² श्रीसत्य-
जीवन वर्मा जी भी इसी मत की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि नरपति साधारण भाट
था जो इधर उधर तुकबन्दियाँ करके गाता फिरता था । और अपने इस मत की
पुष्टि में वे डा० गौरीशंकर हीराचन्द जी ओझा द्वारा प्राप्त एक पत्र का उल्लेख
करते हैं जिसमें डा० ओझा ने उन्हें लिखा है कि राजपूतों में अभी तक नरपति,
महीपति आदि नाम मिलते हैं, जिन्हें सब नापा, महपा कहते हैं³ किन्तु इस
१—सिलेक्शन्स फ्रॉम हिन्दी लिटरेचर—लाला सीताराम बी० ए०—
पृ० ३८-३९ ।
२—हिन्दी साहित्य का इतिहास—पृ० २७-२८ ।
३—बीसलदेव रासो—सं० सत्यजीवन वर्मा—पृ० ४५ भूमिका ।