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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

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Page 68
  • ३१ -

जाय। इसी बीच बारात राजद्वार पर आती है। राजा बीसलदेव तोरण के
नीचे सूर्य के समान उदित होता है और सजी-धजी स्त्रियाँ उसकी आरती उता-
रती हैं। शुभ मुहूर्त में राजा बीसलदेव और कुमारी राजमती का पाणिग्रहण
सम्पन्न होता है। विवाह-मण्डप में बीसलदेव और राजमती कृष्ण और
रुक्मिणी की तरह सुशोभित होते हैं।
मालवा देश में बड़े उत्सव मनाये जाते हैं। भांवर के समय पहले फेरे के
पायण में बीसलदेव को राजा भोज आलोसर (स्थान विशेष) तथा मालवेश
(स्थान विशेष) देता है। दूसरे फेरे पर राजकुमारी की माता भानुमती
अपने दामाद को अर्थ, द्रव्य का भण्डार, सपादलक्ष देश, तोड़ा, टउक, बूँदी
और कुडालदेश देती है। तीसरे फेरे पर राजा भोज राजमती के साथ ताजी
और केकाण (घोड़े) मंडोवर का देश तथा समुद्र के साथ सोरठ और समस्त
गुजरात देता है।¹ पाणिग्रहण सानन्द समाप्त होता है। बीसलदेव अपनी सास
को नमस्कार करने के लिये जाता है और रानी भानुमती 'अजमेर' में अविचल
राज्य करने का आशीर्वाद उसको देती हैं।
पहिरावनी (वस्त्र भूषणादि पहनाने का रस्म) होती है। सुहावनी धार नगरी
को छोड़कर धार का दीपक (राजमती) अजमेर गढ़ को प्रदीप्त करने चढ़ता
है।² बारात के लौटने पर अजमेर गढ़ में बड़ा हर्ष मनाया जाता है और राजा
अपने मन्त्री से कहता है कि "या तो मुझसे सृष्टिकर्त्ता प्रसन्न हुआ या मैंने
विधि का लिखा प्राप्त किया, जो मैं राजा भोज की चौरी पर चढ़ा अर्थात् राजा
भोज की कन्या का पाणिग्रहण किया।"³
१-नोट—रूपान्तर न० २ में फेरों के समय पायण स्वरूप दिये हुए स्थानों
के नाम में अन्तर है। इस रूपान्तर के अनुसार प्रथम फेरे में 'आलीसर'
और कुडाल देश देने का, दूसरे फेरे में घोड़े, धन, मढोवर, सौराष्ट्र और
गुजरात देने का, तीसरे फेरे में सांभर, तोड़ा, और टोंक देने का तथा चौथे
फेरे में चित्तौड़ देने का वर्णन है। रूपान्तर न० १ में चौथे फेरे का कोई
वर्णन ही नहीं है।
२—रूपान्तर न० २ में विवाह के पश्चात् अजमेर लौटते समय रास्ते में
'अनासागर' मिलने का उल्लेख है। लेकिन ऐसा कोई उल्लेख रूपान्तर
न० १ में नहीं है।
३—नोट—रूपान्तर न० २ में प्रथम खण्ड की कथा यहीं समाप्त होती है
और द्वितीय खण्ड की कथा कवि पुनः गणेश की वंदना करके आरम्भ करता है।