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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 67 of 315

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Page 67
  • १० -
    स्त्रीय चरित्र घण छप अहइ।
    एक ही अषर सरब विणास॥
    कवि कथा का प्रारम्भ गणेश की वन्दना और सरस्वती से यह वर मांगते
    हुए करता है कि वह उसकी भूली हुई काव्यशक्ति को उसे सौंप दें ताकि वह
    ग्रन्थ की रचना करने में समर्थ हो सके। तत्पश्चात् कवि राजा भोज की सभा
    का वर्णन करता है। महाराज भोज की रानी उनसे प्रस्ताव करती है कि वे
    अपने अच्छे दिन रहते राजकुमारी का विवाह कर दें। रानी के इस प्रस्तावानुसार
    राजा ज्योतिषी को बुलाकर अपनी कन्या के लिये सुयोग्य वर खोजने के लिये
    आग्रह और निवेदन करता है,१ तथा यह भी कहता है कि वह (ज्योतिषी)
    वीर विख्यात बीसलदेव चौहान को, जो हर प्रकार से उसकी कन्या के योग्य है,
    उसकी कन्या के लिये वर चुने। ज्योतिषी द्वारा शुभ सूचना प्राप्त होने पर
    राजा भोज लग्न निश्चित करता है और लग्न की सुपारी ब्राह्मण और भाँट के
    हाथ अजमेरगढ भेजता है। अजमेरगढ पहुँचकर ब्राह्मण लग्न की सुपारी
    बीसलदेव को देता है जिसे प्राप्त कर बीसलदेव हर्षित होता है और कहता है
    कि परमार जाति की कन्या के कुल में आने पर चौहान कुल का उद्धार हो
    जायगा। यह कहकर बीसलदेव ब्राह्मण और भाँट को नाना प्रकार की बहुमूल्य
    भेंट देकर उनको विदा करता है।
  • निश्चित तिथि पर बारात अजमेरगढ से प्रस्थान करती है। बारात में इतने
    'अधिक घोड़े, हाथी, सैनिक तथा बराती हैं कि उनके पदों की धूल, उड़ने; से
    'सूर्य आच्छादित हो जाता है और इस बड़ी बारात के साथ राजा बीसलदेव
    'धार नगरी में पहुँचता है। राजमती राजा बीसलदेव को देखकर बहुत
    हर्षित होती है तथा अपनी सखियों से कहती है कि सम्पूर्ण कलाओं से युक्त
    पूर्णिमा के चन्द्रमा की भाँति, स्वर्ग के देवताओं और मनुष्यों को मोहित करने
    वाले तथा गोकुल में प्रत्यक्ष गोविंद की भाँति बीसलदेव की आरती उतारी
    १—रूपान्तर न० २ में राजा भोज की अनुमति से उनका पुरोहित वर
    ढूंढता हुआ चारों ओर जाता है। जैसलमेर, टोडा, अयोध्या, दिल्ली, मथुरा
    आदि स्थानों में जाकर राजमती के लिये वर ढूंढता है लेकिन उसे राजमती के
    अनुरूप कोई वर इन स्थानों में नहीं मिलता। तब वह अजमेर जाता है और
    बीसलराय को देखता है। इन्हें देखकर वह इनको राजमती के उपयुक्त, हर
    प्रकार से पाता है और इसकी सूचना राजा भोज को देता है।