बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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पुत्ते जाएँ कवणु गुणु अवगुणु कवणु मुएण ।
जा बप्पी की भुंहड़ी चंपिज्जइ अवरेण ॥
"अपभ्रंश व्याकरण, हेमचन्द्र आचार्य"
जेवडु अंतरु रावण रामहं तेवडु अंतरु पट्णगामहं ।
"वही"
जा मति पच्छइ संपज्जइ सामति पहिली होइ ।
मुंज भणइ मृणालवइ विघन न वेढइ कोइ ।
"प्रबन्ध चिन्तामणि"
जइ यह रावणु जाइयउ दहमुहु इक्कु सरीरु ।
जणणि वियंभी चिंतवइ कवणु पियावडं खीरु ॥
"वही"
उपर्युक्त उदाहरणों में : बीसलदेव रास में :
संज्ञा संज्ञा
पुत्तैँ, बप्पी, पट्टण घूमडा, सेजटी, मोजडी,
रामहं, दह, मुंढ, इक्कु भाटणि, नयण, घहरणि,
सरीरु, जणणि, खीरु पतउड, ग्रीपणउ, सुपिनउ,
भुंहडी आदि । तनरु, आदि ।
क्रिया क्रिया
भजइ, वेढइ, चिंतवइ, भयइ, गियइ, जडइ,
पियावडं आदि । ओलावइ, आदि ।
संज्ञा और क्रिया के रूप जैसे "अपभ्रंश व्याकरण" और प्रबन्ध-चिन्तामणि
में हैं वैसे ही बीसलदेव रासो में भी हैं । हेमचन्द्र आचार्य के व्याकरण का रचना-
काल वि० संवत् १२०० के लगभग और प्रबन्ध चिन्तामणि का संवत् १३६१ है,
लेकिन हेमचन्द्राचार्य के व्याकरण में उद्धृत की हुई पंक्तियाँ उदाहरण-स्वरूप
आई हैं । अतः निश्चय ही ये पंक्तियाँ ग्रन्थ की रचना के पहले की हैं । इसी
प्रकार "प्रबन्ध चिन्तामणि" की भाषा के लिए भी कहा जा सकता है कि जिस
अपभ्रंश के व्याकरण का उल्लेख इसमें हुआ है वह इस ग्रंथ की रचना के बहुत
पहले जन-साधारण की भाषा रही होगी और उसके पश्चात् ही "प्रबन्ध चिन्ता-
मणि" के रचयिता ने उसी भाषा के संस्कृत रूप को अपने ग्रन्थ में स्थान दिया