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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

DevanagariHindipublished315 pages

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Page 33

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की कसौटी पर कस कर देखना होगा कि प्राप्य संवतों में से किस संवत् को तिथि,
वार आदि गणना की कसौटी पर खरे उतरते हैं ।
प्राप्य हस्तलिखित प्रतियों में, प्राचीनतम संवत् हमें १०७७ मिलता है
संवत् १६६३ की प्राप्य प्रति में, जो अबतक की प्राप्य प्रतियों में सबसे प्राचीन
है, भी यही संवत् दिया हुआ है । इस संवत् के साथ तिथि श्रावण सुदि ५
तथा नक्षत्र रोहिणी दिया हुआ है । वार इसमें नहीं है । चैत्रादि संवत् के अनुसार
वि० सं० १०७७ श्रावण शुक्ला ५ को गुरुवार और हस्त नक्षत्र था और कार्त्ति-
कादि संवत् के अनुसार उक्त तिथि को सोमवार और हस्त नक्षत्र आता है ।¹
यदि दिन के उल्लेख के अभाव के कारण किसी प्रकार इस संवत् को ग्रंथ का
रचना-काल मान भी लिया जाय तो नक्षत्र की विभिन्नता इस संवत् को मानने
में बाधा उपस्थित करती है । दूसरा प्राप्य संवत् १००३ है । इस संवत् के साथ
मास, पक्ष, तिथि, वार आदि कुछ नहीं है, इसलिए इस सम्बन्ध में कोई जाँच
सम्भव नहीं । इसके पश्चात् विचारणीय संवत् १२७२ है जिसका दूसरा
अर्थ १२१२ भी लगाया गया इस संवत् के साथ तिथि तथा वार का उल्लेख
है, नक्षत्र का नहीं । पं० गौरीशंकर हीराचन्द जी ओझा का मत है कि चैत्रादि
विक्रम संवत् १२७२ ज्येष्ठ बदी शुक्रवार था तथा कार्त्तिकादि वि० सं० के अनु-
सार अर्थात् चैत्रादि १२७३ में उक्त तिथि को गुरुवार आता है । दिन मिल
जाने के कारण ओझाजी ने इसी संवत् को ग्रंथ की रचना-तिथि माना है² ।
इस संवत् के दूसरे अर्थ का अर्थात् १२१२ का समर्थन आचार्य रामचन्द्र जी
शुक्ल तथा श्री सत्यजीवन जी वर्मा करते हैं । इन लोगों के मतानुसार गणना
करने पर विक्रम सं० १२१२ में ज्येष्ठ बदी ६ को ही बुधवार पड़ता है ।³ श्री
सत्यजीवन जी वर्मा का तो यहाँ तक कहना है कि "सं० १२७२ में जेठ बदी
नवमी बुधवार को नहीं पड़ती ।⁴ इस संवत् के सम्बन्ध में उपर्युक्त विद्वानों के
दो विपरीत मतों ने एक विषम समस्या उपस्थित कर दी है । सं० १२१२ में
भी जेठ बदी ६ को बुधवार का पड़ना और १२७२ में भी उसी तिथि को बुधवार
का पड़ना, एक ऐसी समस्या है जिस पर विचार करना आवश्यक है । खेद है
1 Indian Ephemaris, vol III, PP 43, 45
२. ना० प्र० प०, १९६७, अंक २, पृ० १६३ ।
३. हिन्दी साहित्य का इतिहास सं० २००३, पृ० २४ ।
४. बीसलदेव रासो—पृ० ५ भूमिका ।