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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

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Page 3

दो शब्द
'बीसलदेव रासो' पर मेरे द्वारा कार्यारम्भ के पहले यद्यपि
श्री सत्यजीवनजी वर्मा द्वारा सम्पादित प्रति प्रकाशित हो चुकी थी फिर भी
डा० सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या एवं डा० सुकुमार सेन महाशय ने आदेश दिया कि
वैज्ञानिक ढंग से मैं इसका संपादन करूँ । गुरुजनों के आदेश का पालन करना
अपना कर्त्तव्य समझ कर मैंने कार्य आरम्भ किया । मेरे कार्य के मध्य में ही
इसकी दूसरी प्रति भी डा० माताप्रसादजी गुप्त द्वारा सम्पादित होकर प्रकाशित
हो गई । लेकिन मेरा कार्य अपनी गति से चलता रहा ।
इन दोनों प्रकाशित प्रतियों के सम्पादकों में से श्री सत्यजीवनजी वर्मा ने
सं० १६६६ की इसकी पाण्डुलिपि को अपने सम्पादन का आधार माना है ।
जिस समय उन्होंने सम्पादन-कार्य किया था, सम्भवतः उस समय तक १६६६
की पाण्डुलिपि को छोड़कर अन्य पाण्डुलिपियों की सूचना उन्हें प्राप्त न हो
सकी थी । अस्तु, उन्होंने अपने द्वारा सम्पादित पुस्तक में विभिन्न पाण्डुलिपियों में
प्राप्त विभिन्न पाठों का उल्लेख नहीं किया है ।
डा० माताप्रसादजी गुप्त ने जिस काल में इसका सम्पादन-कार्य किया,
उस समय इसकी अनेक पाण्डुलिपियाँ उपलब्ध हो चुकी थीं और उन्हें प्रायः
सभी पाण्डुलिपियों के अवलोकन का सुअवसर भी प्राप्त हो चुका था । प्राप्त
पाण्डुलिपियों में सबसे प्राचीन पाण्डुलिपि सं० १६३३ की है। डा० गुप्त ने
अपने सम्पादन का आधार इसीको बनाया और विभिन्न पाण्डुलिपियों में
प्राप्त पाठों का उल्लेख भी अपनी पुस्तक में किया। लेकिन उन्होंने अन्य
प्रतियों के छन्दों के साथ इस प्रति (१६३३) के छन्दों की तुलना करके
केवल १२८ छन्दों को ही प्रामाणिक माना और इन १२८ छन्दों के ही विभिन्न
पाठों का उल्लेख भी किया, यद्यपि १६३३ की पाण्डुलिपि में २४६ छंद हैं।
मैंने प्रस्तुत सम्पादन-कार्य सं० १६३३ वाली पाण्डुलिपि के प्रत्येक छंद को
प्रामाणिक मानने का कारण बताते हुए नये ढंग से किया है । इसके अति-
रिक्त मैंने एशियाटिक सोसाइटी, बंगाल में प्राप्त 'बीसलदेव रासो' की उस