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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

DevanagariHindipublished315 pages

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Page 255
  • १४६ -
    राय जोगिनिउ १ पट्टउठ जाउ नहं २ पठद्धि ।
    मसम सरीरि नहं ३ विभूति की पड़द्धि ४ ॥
    साकि धतुरा खत्ति ५ पर्या ६ ।
    उठद्ध ७ रायो नह दासी डोघत्ती पाइ ॥
    साध्य मोती पोयती ।
    उथ ८ सतपिणि ९ मोली दीया वद्धासि ॥२१६॥
    १. आ० ६ जोगिनो, आ० १२ योगिनी ।
    २ आ० ६ जाइ ग्रह पैठो, आ० १२ जाइ ग्रह बइठौ ।
    ३ आ० १२ ( में नहीं है ) ।
    ४. आ० १२ विभुत की पात्ति ।
    ५. अ० २ विम, आ० १२ यग्रति ।
    ६. अ० २ घणवै ।
    ७ आ० १२ ( में नहीं है ) ।
    ८+६ आ० ६ ततपिणि, आ० १२ ऊठी ।
    यह छंद अ० २ खट ३ में ७६, ७७, आ० ६ घट ३ म
    ७१, ७५ आ० ६ में २२१ तथा आ० १२ में २१४ है । लेकिन
    अ० २ और आ० ६ में यह छंद निम्न प्रकार है -
    अ० २ (७६) आ० ६ (७४) जोगो बइठो पउलइ जाइ ।
    धभूति सरीसी पोलि कयइ ॥
    आक धतूरा विस घण ।
    बोलइ नोलती बचन मुडाल (आ० ६ बुढोल)॥
    राय लीष्यो रो आवीया ।
    बेगी चचावइ रूपा की माल ॥
    अ० २ (७७, आ० ६ (७५) राय आपण बानो पोइता जाइ ।
    जाइ प्रयान सुणाब्या माहि ॥
    सघलो रावल ढलहलै (आ० ६ फलमलै) ।
    साचन पोवती मोनी की माल
    ( माहि गाल आ० ६ ) ॥
    दासी जाइ सुणपीयो ।
    तब धन उठी मोतीअ चलि ॥