बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें– १४८ –
मोमन अधिक उमाहद्दढ ।
जाणउ आज मिलणह¹ सपी सामरि राव² ॥२१७॥
तय जोगिनठ गढ़ अनमेर ।
फिरि करि दीठानी³ च्यारं देस⁴ ॥
पठखिया पउत्ति उघाडि नह ।
सउ सह⁵ राजमती रानी नह देपाइ ॥
छिपउ⁶ आपउ राउ बहुगुण कड ।
दृढ⁷ मुषि वचन कईउ⁸ समुझाइ ॥२१८॥
१. आ० २ तुभ मिलसो, आ० ६ सफै तो मिलै मोहि, आ० ६ जाणो
आज मिले, आ० १२ बाणु आज मिले ।
२. आ० २ आ० ६ सीचरयो राइ, आ० १२ सांबरिराइ ।
यह छंद आ० २, खड ३ में ७८, आ० ६ खंड ३ में ७७,
आ० ९ में २१६ तथा आ० १२ में २१२ है ।
लेकिन आ० २ और आ० ६ में १ पक्ति है—आज रूपी म्हारो
फरकै अग ।
३ पक्ति है—नहीं है ।
५ पक्ति है—हेत (आ० ६ चित्त) जगायो हे सपी ।
३. आ० १२ ( में नहीं है) ।
४. आ० ६ च्यारिउ सेर, आ० १२ चारू सेर ।
५. आ० ६ तो ।
६. आ० १२ लिप्यो ।
७. आ० १२ हु ।
८. आ० १२ वचने कहूं ।
यह छंद आ० ६ में २२० तथा आ० १२ में २१३ है ।
लेकिन आ० १२ में १ली पक्ति है —
“योगनउ पहुतो गढ़ अजमेर ।”
४ थी पंक्ति है—"राखी राजमती ने देहि बोलाई ।”