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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 25 of 315

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Page 25

२ - १७ -
संकेत 'प्र०' नं० ५ संकेत 'आ' नं० ८ संकेत 'आ०', नं० ५ संकेत 'घा०'
तथा 'म०' समूह की न० २ संकेत 'मृ' प्रतियाँ आती हैं। इस तुलनात्मक
अध्ययन से इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है कि उपर्युक्त चार समूहों में से तीन
समूहों में डा० गुप्त के दो समूहों 'प०' अथवा सं० समूह की कोई न कोई
प्रति अवश्य है। विशेष रूप से 'घ' समूह में तो डा० गुप्त के 'पं०' तथा
'सं०' दोनों समूहों की प्रतियाँ हैं। डा० गुप्त के 'प०' समूहकी न०-३ प्रति स०
१६३३ की लिखी हुई है जिसे यहाँ 'भ०' समूह में रखा गया है; क्योंकि
कथित विभाजन के अनुसार यह प्रति १७ वीं शताब्दी की है और सबसे प्राचीन
प्राप्य प्रति है। डा० गुप्त ने अन्य जिन प्रतियों को इस समूह (प० समूह)
में रखा है उनमें से सं० १७२७ और १७५१ वाली प्रतियों को छोड़कर जिन्हें
यहाँ 'आ' समूह में १८ वीं शताब्दी की होने के कारण रखा गया है, प्राय किसी
भी प्रति में पुष्पिका नहीं है। ऐसी प्रतियों की संख्या इस समूह में पाँच है।
जिन प्रतियों में पुष्पिका नहीं है, वे किस संवत् में लिखी गईं यह एक विवादा-
त्मक प्रश्न है। अतएव उनको इस संपादन कार्य में विशेष स्थान नहीं दिया
गया है। पुष्पिका के अभाव के कारण ही ये प्रतियाँ यहाँ 'ख' समूह में रखी
गई हैं। डा० गुप्त के 'सं०' समूह की १६६१ वाली प्रति (नं० १५) भी कथित
'घ' समूह में आती है जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है। 'सं०' समूह में डा०
गुप्त ने इस प्रति के अतिरिक्त एक और प्रति को रखा है जिसकी संख्या १५ है
तथा संकेताक्षर 'प्र०' है। इस प्रति को यहाँ 'आ०' समूह में रखा गया है क्यों-
कि यह संवत् १७२४ की लिखी है। इन दोनों समूहों के अतिरिक्त डा० गुप्त
के तीन अन्य समूहों की प्रतियों में से 'म०' समूह की एक प्रति न २ संकेताक्षर
'म०' यहाँ 'घ' समूह में रखी गई है क्योंकि इसमें भी पुष्पिका का अभाव है।
इस 'ग०' समूह की एक प्रति और है जिसका पूर्ण विवरण प्राप्त न होने के
कारण न तो उसका परिचय पत्र में ही उल्लेख किया है और न उसे किसी
समूह स्थान ही दिया गया है। दूसरा समूह "म०" समूह है जिसकी केवल एक
प्रति प्राप्य है और वह भी किसी अन्य प्राचीन प्रति की प्रतिलिपि है तथा
पुष्पिका का अभाव है, साथ ही अनेक त्रुटियाँ भी हैं। अतएव इसका तथा
तीसरे समूह 'अ०' में आने वाली दो प्रतियों का भी उल्लेख इन्हीं कारणों में से
किसी एक के कारण परिचय पत्र में नहीं किया गया है।
कथित समूहों तथा डा० गुप्त के समूहों के तुलनात्मक अध्ययन के पश्चात्
(१) बीसलदेव रासो-सं०-माताप्रसाद गुप्त-पृ० ३-१२।