बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
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मात्र को मान लेने पर सबसे टेढ़ा प्रश्न यह उठ खड़ा होता है कि सं० १६३३
वाली प्रति में आये हुए छन्दों में जिनकी संख्या २७६ है, केवल १२८ को ही
कैसे प्रामाणिक मान लिया जाय । चूंकि यह प्रति आज तक की प्राप्य प्रतियों में
सबसे प्राचीन है, इसलिये उचित तो यही होगा कि इसके सभी छन्दों को प्रामा-
णिक माना जाय । इसके बाद वाली प्रतियों में जो छन्द इसके नहीं प्राप्य हैं,
उनके सम्बन्ध में ऐसा समझना होगा कि परवर्ती लेखकों को वे छन्द या तो ज्ञात
नहीं हुए अथवा ज्ञात होते हुए भी उन लेखकों ने उन छन्दों को छोड़ दिया हो
और स्वरचित छन्दों को जोड़ दिया हो ।
इसी आधार को ध्यान में रखकर सं० १६३३ की लिखी हुई प्रति को
प्रामाणिक माना गया है । उसमें आये हुए सभी छन्दों को प्रामाणिक मानते हुए
प्राप्य २७ प्रतियों को उनकी पुरावता के आधार पर चार समूहों में विभाजित
किया गया है । कार्य की सुविधा के लिये इन चार समूहों का संकेताक्षर क्रमशः
'अ', 'आ', 'क' एवं 'ख' रखा गया है ।
(१) 'अ' समूह— इस समूह में उन सभी प्रतियों को स्थान दिया गया है,
जो १७ वीं शताब्दी की हैं । परिचय पत्र में इनकी संख्या
१ से ५ तक है ।
(२) 'आ' समूह— इस समूह में वे सभी प्रतियाँ आती हैं, जो अट्ठारहवीं
शताब्दी की हैं, तथा जिनकी संख्या परिचय पत्र में ६ से
१३ तक है ।
(३) 'क' समूह— यह समूह १६ वीं शताब्दी की लिखित प्रतियों का है ।
इसमें परिचय पत्र के अनुसार केवल एक प्रति सं० १४
वाली आती है ।
(४) 'ख' समूह— इस समूह में परिचय पत्र की शेष संख्या १५ से २७ तक
की वे सभी प्रतियां हैं, जिसका लेखन काल ज्ञात नहीं है ।
उपर्युक्त विभाजन के अनुसार (१) 'अ' समूह में डा० गुप्त की 'प०'
समूह की नं० ३ संकेताक्षर 'प०' तथा 'सं०' समूह की नं० १४ संकेताक्षर
'सं०' वाली प्रतियाँ आती हैं । (२) 'आ' समूह में डा० गुप्त की 'सं०'
समूह की नं० १६ संकेत 'प्र०', प० समूह की नं०-६ संकेत 'की०' तथा
नं० ६ संकेत 'र०' वाली प्रतियाँ आती हैं । (३) 'क' समूह में डा० गुप्त के
की कोई प्रति नहीं आती । (४) 'ख' समूह में डा० गुप्त के 'प०' समूह नं० ६