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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

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DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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पृष्ठ 204
  • ६८ -
    एक टखगाजउ ऊखग जाइ ।
    इक विगताउड मिलन¹ पराइ ॥
    नृप धाटेरीय पग भनइ² ।
    म्हावत नागदृदा³ नाह की सगुणी हँ⁴ नारि ॥
    रहा धरि पाटि विदेस गउ ।
    येउ⁵ म्हा⁶ जोटीय न⁷ सिरजीव कोइ करतार⁸ ॥
    आठ पहर उचाट माहि ।
    तिय दुषि धण पजर⁹ हुई ॥१३६॥
    असीव मास की मुइहइ¹⁰ पेखि ।
    देख पउश्रा¹¹ मिट पांडुरा वेस ॥
    आइ आसासइ संधरी ।
    मति¹² आगह अह¹³ रूदन करंति¹⁴ ॥
    १. आ० १२ एक वणजारो मखज ।
    २. आ० १२ भने ।
    ३. आ० १२ नागृ ।
    ४. आ० १२ सुगुणीय ।
    ५. आ० १२ ( न नहीं है ) ।
    ६. आ० १२ म्हाने ।
    ७. आ० १२ जोढिनइ ।
    ८. आ० १२ ( में नहीं है ) ।
    ९. आ० १२ में 'पजर' के पहले 'मुरि' है ।
    यह छंद अ० २, आ० ६ आ० ६, में नहीं है । आ० १२ में
    १२५ है । लेकिन ५वीं और ७वीं पंक्ति इसमें भी नहीं है ।
    १०. अ० २ हो मूढि, आ० ६ मूढ़ी ।
    ११. आ० ६ शरा ।
    १२ अ० २ गलह ।
    १३. अ० २ नै,
    १४ अ० २ कराई, आ० ६ कहाय ।