बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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अंत—बापगे सबली भूवलो। धरिरंग धीषा बोबो-
पह दीरि। नदी संदेलो समावड दीयड। सहाउद्द मद्दइ
बंघूवह भीमवडह चौकि ॥४५०॥ शुभरह दसइ.........
[ २० ] नाम—पीगल दे रास। कागज—देशी
[ युक्त : पं० (हाथ का बना हुवा) पत्र-चार (दोनों तरफ लिखेहुए) आकार
समूह सं० ५, १० इंच० × ४३/८ इंच० । पंक्तियां-२० से २८ प्रत्येक पृष्ठ पर। छंद
रहित "पा०" ] संख्या-२७७छन्द। प्रकार-पुराना, पूर्ण, साधारणतया ठीक।
अक्षर—देवनागरी । ( बहुत छोटे छोटे लिखे हुए ) सुरक्षित
स्थान—अभय जैन भण्डार (बीकानेर) । इति वीसलदे
रासः । समाप्तः ।
आरम्भ—गवरिका नन्दन त्रिभुवन सार। मात भेदइ
धारा उदर मण्डार। एक दंतड शुषिक ललहलइ । सुषक
बाहण तिलक सिन्दूर। कर जोडी नरपति भयइ । जांबिकि
रोहिणी ज्युं सप्यो सूर ।
अंत—धन्य हो पंडित्या धन्य हो राइ । धन्य हो जोगी
दरसणी। वेग मेछावड घण कठ नाइ । धन्य दिहाडो भाज
कठ । रांधी राजमती मिलवड वीसल राउ । ॥४५॥ कनक
पयोधर हेम कपोल। केलि गरभेही कूं घणो । घाइल ज्यूं
घण मोहइ नाइ । कडि मोहइ चाले गोरडी। इनि को विरह
वेदना नपि छहइ कोइ । ज्यू राजा राणी मिल्या । खुं
नाहइ कठे मिलड्यो सऊ कोइ ।।
रचना तिथि—संवत् सहस तिहत्तरइ जाणि। नाहइ
कवि सरसीप पाणि। शुक्ल सुष्या भांण का। सुफल पञ्चमी
श्रावण मास। रोहिणी नक्षत्र सोभामबउ । सुदिन गिण
जोडीयो रास ।
[ २१ ] नाम—बिसलदे रास । कागज—देशी
( हाथ का बना हुआ ) पन्ने—अट्ठारह ( दोनों तरफ लिखे
हुए ) । आकार—१०३/४ इं० × ४३/४ इं० । पक्तियों—
तेरह पंक्तियां प्रत्येक पृष्ठ पर । छंद संख्या—२५० छन्द
तथा दो पंक्तियां अतिरिक्त । प्रकार—पुराना । अपूर्ण ।