Skip to content
SarvaKosh
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished315 pages

Page 18 of 315

Read in context
Page 18
  • १० -
    प्रकार-पूर्ण, पुरानी साधारणतया ठीक। अक्षर--देव-
    नागरी। सुरक्षित-स्थान अभय जैन भण्डार (बीकानेर)
    पुष्पिका नहीं है।
    आरम्भ-गवरिका नदन त्रिभुवन सार। भाद भेदह
    धारा उदर भण्डार। एक दंत सुपिक सलहल्लह। मुसाको
    वाहण तिलक सिंदूर। कर उपोटि नरपति भणइ। जाणिकि
    रोहणी इयुं तप्पौ सूर।
    अंत-कनक काया मिली कुंकुं रोज। कनक पयोधर
    हेम क चोज। केलि गरमसि फू धली। घाइल धण मोदह
    नाक। कटि मोडे चाले गोरडी। उछिक विरह वेदना
    न विखहे कोइ। ज्यु' राजा राणी मिल्या। स्यु' मालह कहै
    मिलिज्यौ सकछोह।
    रचना तिथि-संवत् सहसविदरे जाणिय। नाल्ह कवी
    सरस सरसीय बोधिय। गुण गुण्था थऊ घण का। सुकल
    पख्य पचमी श्रावण मास। रोहिणी नक्षत्र सोहामवण। सुदिन
    मित्य जोडीयो रासि।
    [१७] बीसलदेव चहु आण रास) कागज-
    देशी (हाथ का बना हुया) अक्षर-देवनागरी। छंद-
    संख्या-३१० । सुरक्षित स्थान-खरतरगच्छ भण्डार
    (कोटा)। पुष्पिका नहीं है।
    आरम्भ-गवरिका नंदन त्रिभुवन सार। नाइ भेदह
    धारइ उदर भण्डार। एक दंत सुखि सलहल्लह। मूपक वाहण
    तिलक सिंदूर। कर जोडी नरपति भणइ। जाणवि रोहिणी
    जिउ तप्पउ सूर।
    अंत-कनक कनि सउं कुडुम रोज। कठिन पयोधर
    हेम कचोल। वेलि गरम मिसि फूंकली। घाइल जिम घण
    मोदहू जी नाक। कटिम मोड चाढल गोरडी। उलहइ विरह
    की वेदना नहिं खलइ कोइ। राणी ही राजा जिमि मिल्या।
    तिम नल्लह कहै मिळण्वी सहु कोइ ।