Skip to content
SarvaKosh
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished315 pages

Page 16 of 315

Read in context
Page 16

– ८ –
दूँद । प्रकार—पुराना; पूर्ण साधारणतया ठीक । अक्षर—
देवनागरी । सुरक्षित स्थान—एशियाटिक सोसाइटी पुस्त-
कालय (बंगाल) कलकत्ता ।
पुष्पिका=इति श्रीवीसलदे चौहान को रास समाप्तं ।
संवत् १७७५ वर्षे सात दी माधव पुरा मध्ये लिख्यते । कृष्ण
पक्ष । प्रदोषवार माधवी रूपे केती लिखायो ॥
आरम्भ—श्री गणेशायनमः गउरिंदा नंदन त्रिभुवन
सार । नाद भेदह धारइ टदर भण्डार । एक दंसठ मूचे
झलहलइ । मुपगड घाइल विदारु सिंदूर । कर जोटी नरपति
भणइ । जोथि करि रोहिणी जिउसपह सूर । अवदान देधुरे
रचितलइ ।
अन्त—कनक काया निसी कुं कुं रोछ । कठिन पयोहर
हेम कपोल । केहि गरम रूप की द्याछी । धोरन क्युगल
मोडे माक । कढि मोटि गई गोरडी । अधिक। विरह वेदना
न छडै कोइ । ज्यु राजा राणो निस्र्यो । स्यु नाहल कहै
भिलिज्यो समु कोइ ॥
रचनातिथि—सवत् सहसतिहुत्तरे जांणि । नाहल
कबीसर सरसीय वांणो । गुण गुप्या चौहाण का । शुक्ल पक्ष
पचमी श्रावण मास । रोहिणी नक्षत्र सोहामणी । सुदिन
तिथि जोडीयो रास ॥
[१३] यह प्रति बीकानेर के कृपाचन्द सूरि—ज्ञान
भण्डार में (बस्ता नं० ४२) है । इसकी पत्र संख्या
१४ है, और छंद-संख्या २४० है । इसका लेखन समय
फागुन यदि ९ शनिशर स० १७८६ है । यह प्रति सोझत
(मारवादा राज्य) में लिखी गई थी । इसमें ग्रन्थ का
रचना काल ‘सवत् सत्तरतिहोत्तरे’ दिया गया है, जो संभवतः
'सहस्र त्रिहोत्तरे' के बदले भूल से लिख दिया गया है,
क्योंकि १७७२ के पहले की लिखी हुई तो अनेक प्रतियां
प्राप्त हो चुकी हैं ।”
[१४] यह प्रति बीकानेर के खरतर आचार्य
शाखा के भण्डार में १६ पत्रों की है। इसकी पद्य संख्या