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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 15 of 315

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Page 15

पुष्पिका—इतिश्री सिंगार बखंन, वीसलदे रास
समाप्तं ॥ संवत् १७५१ वर्षे चैत्र वदि ४ शुक्रवारं ॥ रिखी
मध्ये बा० श्री ५ कनक माणिक्ये गणिजी तत्शिष्यं रतनशे-
खरेण लिपि चक्रे बेगवाणी साद श्री धर्मराज जी वाचनार्थं ॥
श्री रस्तु ॥ कल्याणमस्तु ॥
आरम्भ—गवरिका नंदन त्रिभुवन सार । नाल्ह भेदइ
थारे उदरि भण्डार । एक दंतउ मुपि झलहले । मूषक वाहण
तिलुक सिन्दूर । कर जोडी नरपति भणै । आथि करि रोहिणी
सुं तप्यो सूर ॥ १ ॥ कई मुवअन देखइ रवि वलें ।
अंत—कनक काया जैसी कूंको रोल । कठिन पयोधर
हेमा कचोल । केलि गरभती कु भली थाइझ जि घर चै नाव ।
मोदि कढि घालें गोरडी । उभि की विर भेटन ना सहै कोई ।
जु राजा राणी मिल्या । स्युं नाल्ह कहै मिल्यौ सबु कोइ ॥
रचना-तिथि—संवत् सहस त्रिहन्तरे जाणि । नाल्ह
कविसर कही अमृअ वाणि । गुण सुण्यो थउडाय फा । सुकल
पक्ष पंचमी श्रावण मास । रोहिणी नक्षत्र सोहामय्यो । सो
दिनं जोई जोड़सी जाड्यो रास ॥
[१०] यह प्रति बीकानेर के जयचन्द्र जी के भण्डार
में विद्यमान है। इसमें कुल ३१ पत्र हैं। इसका लेखन
काल चैत्र सुदि १३ शनिवार संवत् १७५६ है। इसके
अनुसार ग्रन्थ का रचना काल १०३३ है।
[११] यह प्रति बीकानेर के खरतर आचार्य शाखा
के भण्डार में है। इसमें २५ पत्र हैं और २६१ पद्य हैं।
रचना सूचक पद्य में "सहस सरदत्तरह आ० सु० ५ रा"
का उल्लेख है। प्रति सं० १७७३ का० व० ११ तेजरासर
में समयधर्म की लिखित है।
[१२] नाम—वीसलदे चौहाण को रास ।
कागज-देशी (हाथ का बना हुआ) पत्रे—पच्चीस दोनों
तरफ लिखे हुए । आकार—६॥ इूं० x ४ इंच्० । पंक्तियाँ-
१३ से १४ पंक्तियाँ प्रत्येक पृष्ठ पर । पद्यसंख्या—२४२