भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 80, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ें१४२ भावप्रकाशनिघण्टुः
भांग के नाम तथा गुण—भङ्गा, गञ्जा, मातुलानी, मादिनी, विजया और जया ये सब भांग
के पर्यायवाची नाम हैं। भांग-कफ को दूर करने वाली, तिक्तरस युक्त, ग्राही, पाचक, लघु,
तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, पित्तकारक तथा मोह, मद, वाणी और जठराग्नि को बढ़ाने वाली होती है ॥
८२. भांग
हिं०-भांग, भंग, बूटी । बं०-सिद्धि । म०-पं०-मा०-भांग । गु०-भांग । ते०-गंजापि ।
ब्रह्मी०-बिन । मा०-बूटी । क०-भंगी । ता०-कञ्जा । फा०-क(कि)नब, बंग । अ०-हशीश,
बर्कुल ख्याल ।
गांजा
हिं०-गांजा, गंजा, गांझा । बं०, म०-गांजा । ता०-गांजा, येला । गु०-गांजो । ते०-गाजाइ,
बंगि-अकु । फा०-किनब । अ०-कु(कि)न्नब । अं०-Indian hemp (इण्डियन हेम्प), Cannabis
(कॅन्नाबिस्) । ले०-Cannabis sativa, Linn. (कॅन्नाबिस सेटाव्हा, लिन.); Cannabis
indica Lam. (कॅन्नाबिस इण्डिका लॅम.) । Fam. Cannabinaceae (कॅन्नॅबिनेंसी) ।
इसका पौधा भारतवर्ष में हिमालय के निचले प्रदेशों में करीब २ अपने स्वाभाविक रूप में
उत्पन्न होता है तथा पंजाब से पूर्व की ओर बंगाल एवं बिहार तक तथा दक्षिण की ओर परतो
भूमि में बहुतायत से प्राप्त होता है। उत्तरप्रदेश के अल्मोड़ा, गढ़वाल तथा नैनीताल जिलों में
इसकी उपज की जाती है। ट्रावनकोर तथा काश्मीर में भी अल्प मात्रा में इसकी उपज की जाती
है। भांग का पौधा पश्चिमी तथा मध्य एशिया का नैसर्गिक (Native-नेटिव्ह) माना जाता है। मुंगेर,
पंजाब, नागपुर, बहराइच आदि जिलों की भंग अच्छी समझी जाती है। इसका क्षुप-सीधा ३ से
८ फीट एवं कभी-कभी १६ फीट तक ऊंचा होता है। पत्ते-नीचे के समवर्ती और विषमवर्ती दोनों
प्रकार के करतलाकार तथा आधार तक कटे हुये होते हैं। ऊपर वाले पत्ते १-५ भागों में विभक्त
और नीचे वाले ५ से ११ खण्ड में कटे हुए तथा ३ से ८ इञ्च के घेरे में रेखाकार-भालाकार दिखाई
पड़ते हैं। इनके खण्ड तीक्ष्ण दन्तुर, लम्बाग्रयुक्त, आधार की तरफ संकुचित तथा इनका ऊर्ध्व पृष्ठ
गहरे हरे रंग का खुरदरा एवं अधोपृष्ठ हल्के रंग का मृदुरोमश होता है। फूल-हल्के पीत-हरित
रंग के, अक्षिलिंगी एवं गुच्छेदार होते हैं। फल-बहुत छोटे, कुछ दबे हुये, बीज के समान चर्मल
फल (Achene=एचीनी), स्थायी परिपुष्प (Perianth=पेरियैंथ) से आवृत एवं एक २ बीजों से
युक्त होते हैं।
भांग के क्षुप स्त्री जाति और पुरुष जाति इन भेदों से दो प्रकार के होते हैं। स्त्री जाति का
क्षुप कुछ अधिक ऊंचा तथा उसमें पत्र बहुतायत से तथा गहरे वर्ण के होते हैं। इसका क्षुप पुरुष
जाति के क्षुप की अपेक्षा ५, ६ सप्ताह अधिक समय में परिपुष्ट होता है। भांग-यह उपज किये
हुए या अपने आप उत्पन्न इस क्षुप के स्त्री एवं पुरुष जाति के सूखे हुए पत्तों को कहते हैं। इसमें
पुरुष जाति के पुष्प भी होते हैं। पुरुष जाति के पुष्प, पत्तों की अपेक्षा अधिक मादक नहीं होते
जैसा कि स्त्री जाति के पुष्प होते हैं। जून एवं जुलाई के महीने में अधिक ऊँचाई पर होने वाले
क्षुपों का एवं मई और जून में मैदानी प्रान्तों वाले क्षुपों का संग्रह किया जाता है। उन्हें काटकर
ओस तथा धूप में बार २ रख कर सुखाते हैं तथा सूखने पर दबाकर रखा जाता है। गांजा-उपज
किये हुए स्त्री जाति के क्षुपकी सूखी हुई रालदार पुष्पमंजरी को गांजा कहते हैं। इसका रंग मटमैला,
हरा, स्वाद कुछ कटु एवं गंध विशिष्ट प्रकार की मादक होती है। गांजे की जटा २॥ इञ्च से २॥
इञ्च तक लम्बी तथा चौड़ी होती है। एक २ इञ्च लम्बी लकड़ियों के चारों ओर फूलदार शाखायें
हरीतक्यादिवर्गः १४३
लगी रहती हैं। चरस-गांजा के वृक्ष से एक लसदार राल के समान रस निकल कर जम जाता
है उसी को चरस कहते हैं। ओस पड़ने के पश्चात् सुबह चमड़े का कपड़ा पहन कर वृक्षों में रगड़ने
से समस्त चरस कपड़े पर लग जाता है उसी को चमड़े से पृथक् कर गोले या ढेले बना लेते हैं।
या हाथ और पैरों से पुष्पमंजरियों को रगड़ कर हाथ पैरों में चिपके हुए भाग को खुरच कर जमा
कर लेते हैं। हिन्दुस्तान में उत्पन्न हुए वृक्षों से चरस पृथक् नहीं की जाती इसलिए यहां गांजा
तैयार हो जाता है। भारतवर्ष में चरस यारकंद से, काश्मीर के लेह के रास्ते आता है। भारत के
दक्षिण तथा पश्चिम में अधिकतर गांजा नाम से भांग और गांजा दोनों का प्रयोग होता है। भांग
तो पीस कर बनाये हुये पेय को अधिकतर कहा जाता है। पुरी की तरफ गांजे को ही पीसकर
बने पेय को भांग कहा जाता है। भांग, गांजा, चरस तथा बीजों का औषध में व्यवहार किया जाता
है तथा मादक पेय एवं धूम्रपान आदि के व्यसन के रूप में लोग इनका बहुत व्यवहार करते हैं।
चरक सुश्रुतादि प्राचीन ग्रन्थों में इसका उल्लेख नहीं हैं लेकिन बाद में ग्रन्थकारों ने इनका भांग
नाम से अधिकतर उपयोग किया हैं।
शोधन-भांग तथा गांजे को दूध में दोलायंत्र में पकाकर जल से धोकर सुखाकर प्रयोग में
लाना चाहिये ।
रासायनिक संगठन - गांजे में कॅन्नाबिनोन् (Cannabinone) नामक एक मुलायम
बादामी रंग की राल होती है। इस राल का प्रधान तत्व एक लाल रंग का गाढ़ा मादक
(Narcotic) तैल होता है जो वायु के साथ संपर्क में आने पर गाढ़ा तथा अल्प वीर्य हो जाता
है। इस तैल में एक कॅन्नाबिनोल् (Cannabinol; C21 H26 O2) नामक विषैला तत्व रहता
है जो इसमें का कार्यकारी तत्व नहीं है। इस राल के अतिरिक्त इसमें गोंद, शर्करा, कॅल्शियम
फॉस्फेट (Calcium phosphate), अत्यल्प मात्रा में उड़नशील तैल, सेन्द्रिय अम्ल, कलमी सोरा
एवं नौसादर आदि पदार्थ पाये जाते हैं। अफ्रीकी, अमेरीकी एवं भारतीय किस्मों के गुणों में विशेष
अन्तर नहीं है तथा शुष्क अवस्था में अच्छी तरह रखने से बहुत दिन तक इसके गुण भी कम नहीं
होते। गांजे में करीब २६%, भांग में १०% एवं चरस में ४०% राल होती है।
गुण और प्रयोग - भांग एवं गांजे के गुण करीब २ समान ही हैं लेकिन भांग की क्रिया
विशेषतः आमाशय एवं आंत्र पर, अधिक होती है तथा यह गांजे की अपेक्षा अधिक ग्राही
होती है।
यह उत्तेजक, वेदनाहर, शांतिकारक, क्षुधावर्धक, आह्लादकारक, सौमनस्यजनन, स्वापजनन,
आक्षेपनिरोधी (Anticonvulsant), उद्वेष्टननिरोधी (Antispasmodic), गर्भाशयसंकोचक,
मूत्रजनन, संग्राही, बल्य, वाजीकर एवं स्थानिक स्वापजनन है।
इसकी प्रधान क्रिया मस्तिष्क पर होती है। सेवन के पश्चात् करीब आधे घंटे में इसका प्रभाव
मालूम होने लगता है। गांजे के धूम्रपान के पश्चात् तुरत असर होता है। इसकी क्रिया अफीम
तथा मद्यसार की तरह होती है लेकिन इसके वीर्य में विभिन्नता होने के कारण इसका प्रभाव
अनिश्चित होता है। अल्प मात्रा में इसके सेवन से कुछ उत्तेजना आती है तथा आह्लाद मालूम
होने लगता है। किसी भी कार्य में मन एकाग्र होता है। इसके प्रभाव से काल एवं व्यक्तित्व का
ज्ञान नहीं रहता तथा ऐसा मालूम होता है कि घण्टों तक आनन्द से बीता जब कि केवल कुछ
मिनट ही बीते रहते हैं। अधिक मात्रा में प्रलाप होता है तथा तत्पश्चात् निद्रा आती है। निद्रा के
पश्चात् अफीम की तरह इससे थकावट नहीं आती तथा उतना विबन्ध भी नहीं होता । आक्षेप