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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 143 में से

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पृष्ठ 78

१३८ भावप्रकाशनिघण्टुः
वृक्क द्वारा उत्सर्ग के समय वृक्क कोशों को उत्तेजित करने के कारण डिजिटैलिस की
अपेक्षा इससे मूत्रविरेचन अधिक होता है। अधिक मात्रा में रक्तमेह भी हो सकता है। इसका
नूतन वृक्क रोगों में प्रयोग नहीं करना चाहिये ।
( १ ) हृदयोदर, सर्वांग शोफ एवं जलोदर आदि में इसका उपयोग किया जाता है। जिन
व्यक्तियों में डिजिटैलिस के प्रति असहनशीलता होती है उनमें तथा जिनको जीर्ण कफविकार भी
साथ २ रहते हैं उन्हें यह ज्यादा उपयोगी है। इससे काफी मात्रा में मूत्रस्राव होता है। इसका
मूत्रल प्रभाव प्रत्यक्ष वृक्क कोशों की उत्तेजना से एवं रक्ताभिसरण की क्रिया ठीक होने से है।
हृदशोदर में गेजपिल ( Guy's Pill ) नामक पारद एवं डिजिटैलिस के साथ बनी इसकी गोलियों
का व्यवहार किया जाता है।
( २ ) बच्चों के जीर्ण श्वसनी विकारों में इसके शर्बत का उपयोग १०-१५ बूंद की मात्रा में
किया जाता है। जीर्ण कफ विकारों में इससे तीन तरह से लाभ होता है। जीर्ण कफविकारों
में हृदय के दक्षिण विभाग में जो शिथिलता आई रहती है वह दूर होती है, कफढीला
होकर निकलने लगता है एवं पाचन सुधरकर शौच भी साफ होने लगता है। जिनमें कफ बहुत
एवं चिपचिपा होता है उनमें इससे विशेष लाभ होता है। नूतन कफविकारों में इसका प्रयोग नहीं
किया जाता। इपीकैक की अपेक्षा अधिक प्रक्षोभक होने के कारण वमन के लिये भी इसका
उपयोग नहीं करते हैं।
( ३ ) पादकंटक ( Corn = कॉर्न ) पर इसके कंद को पकाकर पीसकर गरम गरम बांधते हैं
तथा मस्सों ( Warts = वार्ट्स ) पर इसके चूर्ण को मला जाता है।
मात्रा-शुष्क चूर्ण ३-१३ र०; सिरप (शर्बत) ३०-६० बूंद; टिंकचर ५-३० बूंद ।
अथ भल्लातकः ( भिलावा ), तन्नाम तत्पक्वफलमज्जवृन्तानां
तस्य च गुणानाह
भल्लातकं त्रिषु प्रोक्तमरुष्कोऽग्निरोऽग्निकः । तथैवाग्निमुखी भल्ली वीरवृक्षश्च शोफकृत् ॥
भल्लातकफलं पक्वं स्वादुपाकरसं लघु । कषायं पाचनं स्निग्धं तीक्ष्णोष्णं छेदि भेदनम् ॥
मेध्यं वह्निकरं हन्ति कफवातव्रणोदरम् । कुष्ठार्शो ग्रहणीगुल्मशोफानाहज्वरकृमीन् ॥
तन्मज्जा मधुरा वृष्या बृंहणी वातपित्तहा । वृन्तमाधुस्करं स्वादु पित्तघ्नं केश्यमग्निकृत् ॥
भिलावा के नाम तथा उसके पके फल, मींगी और वृन्त के गुण-भल्लातक (यह
शब्द तीनों लिङ्ग में होता है), अरुष्क, अरुष्कर, अग्निक, अग्निमुखी, भल्ली, वीरवृक्ष और
शोफकृत् ये सब भिलावा के पर्यायवाची नाम हैं। भिलावे का पका फल-पाक में मधुर रस युक्त,
लघु, मधुर एवं कषाय रस युक्त, पाचक, स्निग्ध तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य, छेदी, भेदक, मेध्य (धारण-
शक्ति के लिये हितकर) एवं अग्निवर्धक होता है। यह कफ, वायु, व्रण, उदररोग, कुष्ठ, बवासीर,
संग्रहणी, गुल्म, शोथ, आनाह, ज्वर तथा कृमि रोग को दूर करता है। भिलावे की मींगी-
मधुर रस युक्त, वृष्य, बृंहण एवं वात पित्त को शान्त करने वाली होती है। भिलावे का वृन्त
(डेंपी जिसमें फल लगा रहता है) मधुर रस युक्त, पित्तनाशक, बालों के लिये हितकर तथा अग्नि-
वर्धक होता है ॥ २२८-२३१ ॥


हरीतक्यादिवर्गः १३६
अथ सामान्यतो भल्लातकगुणानाह
भल्लातकः कषायोष्णः शुक्रलो मधुरे लघुः । वातश्लेष्मोदरानाहकुष्ठार्शो ग्रहणीगदान् ॥
हन्ति गुल्मज्वरश्वित्रवह्निमान्द्यकृमिब्रणान् ॥ २३२ ॥
साधारण रूप से भिलावे का गुण-भिलावा-कषाय तथा मधुर रसयुक्त, उष्णवीर्य, वीर्यवर्धक
एवं लघु होता है और यह वातकफ, उदररोग, आनाह, कुष्ठ, बवासीर, संग्रहणी, गुल्म, ज्वर,
श्वित्रकुष्ठ, अग्निमान्द्य, कृमिरोग तथा व्रण को दूर करता है ॥ २३२ ॥
८१ भिलावा।
हि०, पं०-भिलावा, भेला । बं०-मेला, भेलातुकी। म०-बिब्बा। गु०, मा०-भिलामो ।
क०-गेरकायि । ते०-जिडिमेट्ट्लु, जीड़ीविट्टुलु । ता०-शेनकोट्टै । मला०-चेर्मरं । फा०-बलादुर,
बिलादुर । अ०-हब्बुलकुल्ब, हब्बुलफहूम । अं०-The Marking-nut tree (दि मार्किंग् नट् टी।
ले०--Semecarpus anacardium, Linn. (सेमैकार्पस् ॲनाकार्डियम्, लिन.) Fam-
Anacardiaceae (ॲनाकार्डिएसी) ।
भिलावे के वृक्ष इस देश के विशेष कर गरम प्रान्तों में एवं हिमालय के निचले भागों में
३५०० फीट की ऊंचाई तक सतलज से पूर्व की ओर आसाम तक उत्पन्न होते हैं।
इसका वृक्ष देखने में सुन्दर २० से ४० फीट तक ऊँचा होता है। छाल-एक इञ्च मोटी
धूसर रंग की होती है। छाल पर चोट मारने से उसमें से एक प्रकार का दाहजनक भूरे रंग का
गाढ़ा रस निकलता है जो वार्निश बनाने के काम में आता है। लकड़ी-खाकी मिश्रित लाली युक्त
सफेदी या भूरे रङ्ग की होती है। छोटी २ शाखाओं के नीचे कुछ तीक्ष्ण रोवें होते हैं। डालियों
के अन्त में सघन पत्ते रहते हैं और वे ९ से २४ इञ्च तक लम्बे तथा ५ से १४ इञ्च तक चौड़े,
ऊपर से लट्वाकार-आयताकार एवं सरल धारवाले होते हैं। माघ में पुराने पत्ते गिर जाते हैं
और फागुन में नवीन पत्ते निकल आते हैं, माघ फागुन में इसका वृक्ष फूलता है किन्तु इसके
सिवाय कई बार वृक्षों पर फूल देखने में आते हैं। नन्हें २ फूलों की मञ्जरियाँ आती हैं। पुष्पदल-
हरापन युक्त सफेद या हरापन युक्त पीले होते हैं। फल-एक इञ्च लम्बा तथा पौन इञ्च चौड़ा,
चिपटा सा, हृदयाकृति, चमकीले काले रंग का तथा चिकना होता है। कच्चे फलों में दूध जैसा
श्वेत वर्ण का रस होता है जो पकने पर कुछ गाढ़ा एवं काले रंग का हो जाता है। इस फल का
आधारभाग मांसल तथा नारंगी वर्ण के स्तम्भक से बना होता है जो खाने के काम आता है।
फलत्वक् में एक स्फोटकारक विषैला रस होता है जिससे धोबी कपड़ों में निशान लगाने की स्याही
बनाते हैं। फल के अन्दर की मज्जा स्वादिष्ट होती है तथा वह भी खाने के काम आती है। कुछ
लोगों में पुष्पित भल्लातक वृक्ष के पास सोने से या पुष्पपराग की हवा लगने से शरीर पर सूजन
आ जाती है।
भल्लातक शोधन-औषधि में प्रयोग के लिये अच्छे सुपक्व तथा जल में डालने पर जो
डुब जाँय ऐसे भिलावों को लेकर कतर कर ईंट के टुकड़ों के साथ बोरे के अन्दर रगड़ कर फिर
धोकर काम में लाना चाहिये। इससे उसके अन्दर का तैल सदृश रस कम होकर उसकी
तीव्रता कम हो जाती है। इसके शोधन के पूर्व मुख, हाथ एवं पैर आदि खुले अंगों पर
नारियल का तैल लगा लेना चाहिये। कुछ लोग फलों को केवल उबाल कर ठंडे जल से धोकर
काम में लाते हैं।