भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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( १ ) तिक्तपौष्टिक तथा ग्राही होने के कारण अतिसार एवं संग्रहणी में इससे अच्छा लाभ
होता है । बच्चों के वमन, अतिसार, ज्वर एवं खांसी में इससे बहुत लाभ होता है। इससे पाखाना
पीला होकर मात्रा कम होती है । बच्चों तथा प्रसूता में यदि अतिसार हो तो इसके साथ शृङ्ग भस्म
देना चाहिये । अतीस के साथ भांग एवं षोड़षच मिलाकर अतिसार में दिया जाता है । इसके साथ
सुगन्धि, कटुवी पौष्टिक तथा ग्राही अन्य औषधियां मिलाने से ज्यादा लाभ होता है ।
( २ ) इसको अधिक मात्रा में देने पर ही इसका ज्वरघ्न गुण स्पष्ट होता है लेकिन उस
मात्रा में ज्वर कम होने के साथ-साथ विबन्ध भी हो जाता है जो विषमज्वर के लिये अहितकारक
है । इसलिये विषमज्वर में इसकी अपेक्षा कुटकी ज्यादा लाभदायक होती है । ज्वर पश्चात दौर्बल्य
दूर करने के लिये दीपनीय एवं तिक्त पौष्टिक के रूप में इसका उपयोग अधिक अच्छा है ।
ज्वरातिसार के लिये यह अत्युत्तम औषधि है । इसमें १५ र० अतीस तथा १५ र० रसाञ्जन जल
के साथ देते हैं । इसके साथ सुगन्धि पदार्थ मिलाने से ज्यादा लाभ होता है । बड़ों की अपेक्षा
बच्चों के ज्वरातिसार में यह ज्यादा उपयोगी है ।
( ३ ) मक्षिकविष में इसको मधु के साथ सुबह चटाया जाता है ।
( ४ ) कृमियों को निकालने के लिये इसके साथ विडंग का प्रयोग किया जाता है ।
मात्रा—चूर्ण ३-२ मा० ज्वरातिसार, अतिसार में । चूर्ण-२-४ र० बल्य, तिक्तपौष्टिक ।
अथ लोध्रः 'शावरलोध्र-पटियालोध्र' इति लोके प्रसिद्धयोर्नामगुणानाह
लोध्रस्तिस्त्वतरीटभ्रं शावरो गालवस्तथा ।
द्वितीयः पट्टिकालोध्रः क्रमुकः स्थूलवल्कलः । जीर्णपत्रो बृहत्पत्रः पट्टी लाक्षाप्रसादनः ॥
लोध्रो ग्राही लघुः शीतश्चक्षुष्यः कफपित्तनुत् । कषायो रक्तपित्तासृग्ज्वरातीसारशोथहृत् ॥
शावरलोध्र और पटियालोध के नाम तथा गुण—लोध्र, तिल्व, तिरीट, शावर, गालव ये नाम
लोध्र अर्थात् सावरलोध के हैं और दूसरा जो पटिआलोध (पटानी लोध) है उसके-पट्टिकालोध्र,
क्रमुक, स्थूलवल्कल, जीर्णपत्र, बृहत्पत्र, पट्टी और लाक्षाप्रसादन ये सब नाम हैं। दोनों प्रकार के
लोध्र—ग्राही, लघु, शीतवीर्य, नेत्रों के लिए हितकर, कफपित्तनाशक, कषायरस युक्त, रक्तपित्त,
रक्तविकार, ज्वर, अतिसार और शोथनाशक होते हैं ॥ २१५-२१६ ॥
७५ लोध
हि०-लोध । बं०-म०-क०-लोध, लोध्र । गु०-लोधर । ते०-लोद्दुगचेट्टु । अ०-मुगाम ।
अं०-Lodh (लोध); Symplocos Bark (सिम्प्लोकोस बार्क) । ले०-Symplocos race-
mosa, Roxb. (सिम्प्लोकाँस् रेसिमोसा, राक्सू.) । Fam. Symplocaceae (सिम्प्लोकेसी) ।
यह भारत के पूर्वोत्तर प्रान्त नेपाल, कुमाऊँ से आसाम, बंगाल, छोटा नागपुर, बर्मा आदि
प्रदेशों के जङ्गल और छोटे पहाड़ों में पाया जाता है ।
इसका छोटा वृक्ष-२० फुट तक ऊँचा होता है । छाल-खुरदरी और गहरे धूसर (Grey)
वर्ण की होती हैं । काट-(Blaze-ब्लेझ)-आधा इञ्च तक मोटा, रेशेदार, हल्का पीला परन्तु
हलके नारंगीभूरे रंग की रेखाओं से युक्त होता है । पत्ते-३॥ से ७ इञ्च लम्बे, अण्डाकार-आयता-
का या अण्डाकार-भालाकार; पत्राग्र-तीक्ष्ण, कुण्ठितलम्ब या कुंठित; पत्र तट-आरावत, अस्पष्ट
गोलदन्तुर या क्वचित अखण्ड; पत्र पृष्ठ-कोमल पत्तों का ऊपर का पृष्ठ चिकना तथा अधोपृष्ठ मृदु
रोमश, तथा अन्य पत्नों के पृष्ठ चिकना या मध्यशिरा पर कुछ रोमों से युक्त, चमकीले तथा
हरीतक्यादिवर्गः १२६
ऊपर का पृष्ठ गहरे हरे रङ्ग का; शिराएं-बगल की शिराएं सूखे हुये पत्तों में स्पष्ट, ५-९ जोड़ी एवं
पत्रवृन्त-३ से ३ इञ्च लम्बा होता है। आश्विन से अगहन तक फूल फल आते हैं। फूल-गुच्छों
में, पीले और सुगन्धित होते हैं। फल-अष्ठिफल, प्रायः आध इञ्च लम्बे, आयताकार, चिक्कण,
बैंगनी काले रङ्ग के एवं उनका बाह्यकोष चिपका रहता है । इसकी छाल का व्यवहार किया जाता
है। इसका बाह्यपृष्ठ चिकना धूसरित हरा (यदि कार्क (Cork) के साथ हो तो) तथा आडी
धारियों से युक्त, अंदर का पृष्ठ हलका पीला लेकिन रक्ताभ बादामी दिखलाई देता है तथा इसमें
लम्बाई में गद्देदार धारियां होती हैं। भग्न-छोटा, बाह्य भाग में दानेदार लेकिन अन्दर का
कुछ तन्तु युक्त । बाह्य भाग (Cortical) रक्ताभ बादामी रङ्ग का । गन्ध-हलकी मधुर लेकिन
बन्द डिब्बों में रखने पर तेज हो जाती है । स्वाद-मधुर, सुगन्धि तथा कुछ दाइनक ।
नोट-एक अन्य प्रकार के पठानी लोध्र का वर्णन आगे किया गया है। लोध्र तथा पठानीलोध्र
दोनों ही के गुण करीब करीब समान ही हैं तथा दोनों ग्राही एवं अतिसारादि में लाभदायक
होते हैं। लोध्र का एक पर्याय तिल्वक आया है। चरक के कल्पस्थान में तिल्वक के मूल की
(अन्दर की त्वचा रहित) बाह्य त्वचा का उपयोग विरेचन कराने के लिये किया गया है। इससे
भ्रम होता है कि एक ही वस्तु विरेचक तथा ग्राही कैसे हो सकती है। व्यवहार में भी लोध्र की
छाल विरेचक नहीं होती। शावर या पठानी लोध दोनों की मूल त्वक् का प्रयोग किया गया
किन्तु उससे विरेचन नहीं हुआ। इसके संबन्ध में एक श्लोक मिलता है ।
तिल्वकोऽपि तदाकारो बृहत्पत्रो विशेषतः ।
रक्तत्वचो विरेकी च बृहल्लोध्रेति कथ्यते ॥
डल्हण तिल्वक् के सम्बन्ध में लिखते हैं—तिल्वकः रोध्रः, अन्ये तु रोध्राकारो रक्तत्वक्को
बृहत्पत्रो वैरेचनिकः । इससे मालूम होता है कि लाल छाल वाला, दीर्घ पत्र वाला एवं विरेचक
गुणवाला कोई लोध्र के समान वृक्ष होता है जो तिल्वक है। अभी इसका निर्णय नहीं हो पाया है।
कुछ विद्वानों ने तिल्वक् के स्थान पर रेवांचीनी की छाल का उपयोग विरेचन के लिये करने
को कहा है।
रासायनिक संगठन-लोध की छाल में सम्पूर्ण क्षाराम की मात्रा करीब ०.३२% होती
है जिसमें से एक रवेदार क्षाराम लोटयूराइन (Loturine) ०.२४%, अन्य चूर्णीरूप में
क्षाराम लोटयुरिडाइन (Loturidine) ०.०६% एवं एक और रवेदार क्षाराम कोल्लोटयुराइन
(Colloturine) ०.०२% होते हैं । इसकी राख में सोडियम् कार्बोनेट (Sodium carbonate)
रहता है तथा छाल में लाल रंजक पदार्थ बहुत अधिक मात्रा में होते हैं। इसमें टैनिन द्रव्य नहीं
होते । इसमें का लोटयूराइन क्षाराम अब्राइन (Abrine) एवं हारमॅन (Harman) के
सदृश होता है । इसके सभी क्षाराम विरल अम्ल घोल में अत्यन्त तेज नील-लोललोहितातीत
चमक उत्पन्न करते हैं ।
गुण और प्रयोग-लोध की छाल ग्राही, शीतल, रक्तस्तंभक, श्लेष्मघ्न, व्रणरोपक, शोधन,
बल्य एवं चक्षुष्य है। इससे छोटी रक्तवाहिनियों का संकोच होकर रक्तस्राव बन्द होता है।
इससे श्लेष्मल त्वचा को शक्ति प्राप्त होकर एवं उसका संकोच होकर श्लेष्मा की उत्पत्ति
कम होती है ।
इसका उपयोग अतिसार, प्रवाहिका, रक्तातिसार, रक्तप्रदर, अत्यार्तव, श्वेतप्रदर, सर्वाङ्गशोथ,
यकृद्विकार, ज्वर एवं नेत्ररोगों में किया जाता है।
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६ भाव नि०