भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 6, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ें( १० )
औषधीय वनस्पतियों का शास्त्रसम्मत, अनुसन्धान सिद्ध एवं प्रत्यक्ष परिज्ञान
के द्वारा उपबृंहित विवेचन के लिये मैं अपने मित्र श्री कृष्णचन्द्र जी चुनेकर को
साधुवाद देते हुए उनके मंगलमय भविष्य की कामना करता हूँ । भगवान्
धन्वन्तरि की कृपा से इनके द्वारा भविष्य में आयुर्वेद जगत की निरन्तर सेवा
होती रहेगी ।
आयुर्वेदीय वाङ्मय की श्री-समृद्धि के महत् अनुष्ठान में चौखम्बा परिवार का
विशेष योगदान रहा है। प्राच्यविद्या के प्रकाशन का उनका अपना कीर्तिमान है ।
अनेक प्रकाशन विपत्तियों के होने पर भी चौखम्बा परिवार ने इस श्रेणी के साहित्य
का प्रकाशन अनवरत रूप में किया है—एतदर्थ उनकी श्री-समृद्धि की कामना के
साथ उनको हार्दिक धन्यवाद देता हूँ ।
अन्त में ग्रन्थ की उपयोगिता के सही मूल्यांकन के लिये आयुर्वेद समाज से
साग्रह अनुरोध है कि भविष्य में परिष्कार के लिये समुचित परामर्श देकर चिकित्सा
साहित्य की श्री-वृद्धि में सहायक हों ।
गंगादशहरा
वि० सं० २०२६
गंगासहाय पाण्डेय
प्राक्कथन
यदुपज्ञं हि विज्ञानं द्रव्यस्य गुणकर्मणोः ।
भिषग्भिवन्दितायास्मै भावमिश्राय मे नमः ॥
आचार्य भावमिश्र ने ई० सं० १५००-१६०० में एक ऐसे अपूर्व आयुर्वेदीय
चिकित्सा ग्रन्थ का निर्माण किया जो प्राचीन संहिता ग्रन्थों की श्रृंखला में अन्तिम
कड़ी कहा जा सकता है। इसमें द्रव्यगुण संबन्धी विषय का जो प्रतिपादन किया
गया है वह पूर्ववर्त्ती निघंटुओं (कोश) की अपेक्षा परिष्कृत एवं तत्कालीन
प्रचलित नवीनतम अनुसन्धानों को आत्मसात् करते हुए किया गया है, जैसे
द्वीपान्तरवचा, पारसीक यवानी आदि का सर्व प्रथम उल्लेख इसी में है। इन्हीं
विशेषताओं के कारण इस ग्रन्थ का द्रव्यगुण विषयक भाग 'भावप्रकाशनिघण्टु' के
नाम से प्रसिद्ध हुआ तथा अनेक आयुर्वेदीय संस्थाओं में पाठ्यग्रन्थ के रूप में
इसका उपयोग किया जा रहा है। इसमें सभी प्रकार के द्रव्यों—१ औद्भिद
(वृक्ष, गुल्म, लता आदि—Plants), २ प्राणिज (Animals) एवं पार्थिव
(Minerals) के गुणकर्मों का आयुर्वेदीय पद्धति से वर्णन दिया हुआ है।
मूल ग्रन्थ संस्कृत में श्लोकबद्ध होने से युगानुरूप उसकी व्याख्या की आवश्यकता
थी और इस दिशा में अनेक प्रयत्न भी हुए। प्रस्तुत व्याख्या उसी दिशा में एक
और प्रयत्न है।
इस व्याख्या में संस्कृत के मूल श्लोकों का हिन्दी अनुवाद, द्रव्यों के विभिन्न
भारतीय भाषाओं के नाम, अंग्रेजी तथा लेटिन नाम, वनस्पतियों के उत्पत्ति
स्थान, संक्षेप में उनका परिचय, रासायनिक संगठन, गुण, प्रयोग एवं यथा संभव
मात्रा आदि का उल्लेख किया गया है। संदिग्ध द्रव्यों के सम्बन्ध में विस्तृत
विवेचन किया गया है जिसमें एक नाम से लिये जाने वाले अनेक द्रव्यों का पृथक्-
पृथक् वर्णन दिया गया है, जो संदिग्ध द्रव्य निर्णय में सहायक होगा। प्रत्येक द्रव्य
के वर्णन के साथ कुछ विशिष्ट वक्तव्य 'नोट' के रूप में लिखा गया है जो उसके
भेदोपभेद, अन्य विद्वानों के उसके संबंध में विचार, वादग्रस्तता, अन्य निघंटुओं
एवं संहिता ग्रन्थों के वर्णन से तुलना तथा अनुसन्धान के क्षेत्र आदि पर व्यापक
प्रकाश डालता है। संक्षेप में प्रत्येक द्रव्य के संबंध में प्राचीन काल से लेकर अब
तक के जो भी विचार रहे हैं उनका संकलन किया गया है जो आगे अनुसन्धान में
सहायक होगा। चूँकि रसशास्त्र एक स्वतंत्र विषय के रूप में अब विकसित हो