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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

by भावमिश्र

Source: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (origin)

DevanagariSanskritpublished143 pages

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८ | भावप्रकाशनिघण्टुः
अच्छी समझी जाती है। यह किञ्चित् हरापन या पीलापन युक्त भूरे रंग के साथ खाकी रंग की
होती है। टहनियों पर पत्ते सघन नहीं रहते, बल्कि न्यूनाधिक विपरीत रहते हैं। पत्ते-अडूसे के
पत्तों से कुछ चौड़े महुवे के पत्तों के समान, ४ से ८ इञ्च तक लम्बे, किञ्चित् अंडाकार, नोकदार,
सफेदी युक्त हरे और चमकदार होते हैं तथा स्पर्श में खुरदरे जान पड़ते हैं। वृन्त-१ इंच से
कम एवं उसके अग्र भाग के ऊपरी पृष्ठ पर दो या अधिक सूक्ष्म ग्रन्थियां पाई जाती हैं। वसन्त
ऋतु में पुराने पत्ते गिर कर नवीन पत्ते निकल आते.हैं। फूल-बारीक आम की मंजरी के समान
दिखाई देते हैं। और वे देखने में सफेदी मायल या कुछ पीले रंग के होते हैं तथा उनमें
दुर्गन्ध आती है। फल-किञ्चित् लम्बाई युक्त गोलाकार होते हैं, सूखते सूखते छिलके सिकुड़ जाते हैं
और पांच कोणाकार या पांच रेखा युक्त दिखाई देने लगते हैं। शक्ल सूरत, आकार और डील
डौल एवं छोटे बड़े, लम्बे, गोल इत्यादि भेदों से फल कई प्रकार के देखने में आते हैं।
पूर्व बंगाल, आसाम और ब्रह्मा में एक अन्य जाति पाई जाती है जिसे लेटिन में Terminalia
citrina Roxb. (टर्मिनेलिया सिट्रिना) कहते हैं। इसका वृक्ष ८० फीट तक ऊँचा होता है।
इसके फल २ इंच तक लम्बे होते हैं।
हरीतकी के फल पूर्ण पकने तक वृक्ष में बहुत कम ठहरते हैं। प्रायः कच्ची अवस्था में ही गिर
जाया करते हैं। पका फल उत्तम समझा जाता है। उत्तम फल वह है जो नया हो, और चिकना,
गोल, भारी, तौल में कम से कम १॥ तोले से भी अधिक हो तथा पानी में डालने से डूब जाय।
अपक अवस्था के छोटे, काले, द्राक्ष के समान फल मिलते हैं। यह बड़े हर्रे की अपेक्षा बहुत छोटे
होते हैं। इन्हें हिन्दी में जंगी हरड़ एवं मराठी में बालहिरडा कहा जाता है। इनका स्वाद अधिक
कसैला तथा कड़ुआ होता है।
किसी किसी वाटिका में हरीतकी का वृक्ष नमूने की तरह देखने में आता है। वर्षा ऋतु में
हरीतकी के छिलके को सुगमता से दूर कर गुठलियों को भूमि पर फेंक देने से ही कोई कोई बीज
अङ्कुरित होकर पौधे के रूप में बढ़ते हैं। पतझड़ में पुराने पत्ते गिर जाने से चैत के महीने में
प्रायः इसके पौधे सूखे से दिखाई देते हैं। उस समय से ज्येष्ठ तक पौधों को पानी से कभी कभी
सींचना होता है। बरसात का पानी पड़ने पर नवीन पत्ते निकल आते हैं और पौधे हरे भरे हो
जाते हैं। उसी समय उनको उठाकर स्थायी रूप से इष्ट जगह पर रोपण करना चाहिये। बरसात
का पानी जमा होकर जहां पर तर मिट्टी जमा होती है उस जगह पर रोपण किया हुआ पौधा सतेज
होता है। साधारण वृक्षों की तरह परिचर्या करने से ही इसके वृक्ष तैयार हो जाते हैं।
आयुर्वेद में हरीतकी की जो सात जातियां कही गई हैं उनके आकार तथा रङ्ग रूप और गुण
भी भिन्न भिन्न होते हैं। आयुर्वेद में प्रत्येक जाति की हरड़ के गुणों का वर्णन बहुत ही विचार-
पूर्वक किया गया है, परन्तु आजकल के पाश्चात्य विद्वान् लोग केवल दो ही प्रकार की हरीतकी को
ग्राह्य मानते हैं। शेष जाति की हरीतकियों में यद्यपि प्रकार भेद मानते हैं, परन्तु गुणों में कुछ भेद
नहीं मानते। इस संबंध में विशेष अनुसन्धान की आवश्यकता है।
रासायनिक संगठन-पक्व हरीतकी में करीब ३० प्रतिशत कसैला द्रव्य होता है जो चेब्यूली-
निक एसिड के कारण है। इसके अतिरिक्त टैनिक एसिड २०-४० प्रतिशत, गैलिक एसिड,
राल आदि द्रव्य हैं। इसका विरेचक द्रव्य एन्थ्राक्विनोन के समान है। बालहरड़ में एक हरे रंग
की तैलीय राल मिलती है जिसे कभी कभी माइड्रोवेलानिन् कहा जाता है।
गुण और प्रयोग-हरीतकी श्रेष्ठ मृदु विरेचक द्रव्य है। इससे किसी प्रकार की हानि नहीं
होती। शरीर की सभी क्रियाएं इसके सेवन से सुधरती हैं। इसका उपयोग जीर्ण ज्वर, अतिसार,


हरीतक्यादिवर्गः | ९
रक्तातिसार, अर्श, नेत्र रोग, अजीर्ण, प्रमेह, पाण्डु आदि में लाभकर होता है। जीर्ण कास, अर्श
आदि में अगस्त्य हरीतकी एवं व्याघ्री हरीतकी आदि योगों के रूप में भी इसका व्यवहार
किया जाता है।
हरीतकी अच्छा व्रण रोपक है। मुखव्रण, पुराने घावों तथा अर्श में इसका लेप लाभप्रद है।
दंत मञ्जन के लिये इसका महीन चूर्ण उपयोगी है।
बाल हरीतकी-यह मृदु विरेचक है। जीर्ण विबन्ध एवं अर्श में इसका अच्छा उपयोग
होता है।
मात्रा-चूर्ण २ से ४ माशा।
अथ विभीतकस्य नामानि गुणाँश्चाह
विभीतकस्त्रिलिङ्गः स्यादक्षः १ कर्षफलस्तु सः । कलिद्रुमो भूतवासस्तथा कलियुगालयः ॥
विभीतकं स्वादुपाकं कषायं कफपित्तनुत् । उष्णवीर्यं हिमस्पर्शं भेदनं कासनाशनम् ॥३६॥
रूक्षं नेत्रहितं केश्यं कृमिवैस्वर्यनाशनम् । विभीतमज्जातूदूर्द्धकफवातहरी लघुः ॥
कषायो मदकृच्चाथ धात्रीमज्जाऽपि तद्गुणः ॥ ३७ ॥
बहेड़े के नाम तथा गुण-विभीतक, (यह शब्द तीनों लिङ्गों में होता है), अक्ष, कर्षफल,
कलिद्रुम, भूतवास और कलियुगालय ये सब संस्कृत नाम बहेड़े के हैं। बहेड़ा-मधुर विपाकवाला,
कषाय रसयुक्त, कफ व पित्त का नाशक, उष्णवीर्यवाला, शीतस्पर्श वाला, मल का भेदन करने
वाला, कास का नाशक, रूक्ष, नेत्र तथा बालों के लिये हितकर, कृमि तथा स्वरभेद को दूर करने
वाला होता है। बहेड़े की मींगी-प्यास, वमन और कफ एवं वायु का नाश करने वाली,
लघुपाकी, कषाय रस युक्त और मदकारक होती है। इसी भांति आंवले की मींगी के भी ये ही
सब गुण हैं ॥ ३५-३७ ॥
२ बहेड़ा
हि०-बहेड़ा, फिनास, भैरा, बहेरा । ब०-वयड़ा, बोहेरा, बेहरी, बहेड़ा । म०-बेहड़ा, बेहाड़ा,
घाटींग, बहेला, बहड़ा। गु०-वेहेड़ा, बेड़ा । क०-तोड़े, तोरै, तारेकायि । ते०-तडिवेटटु, बह्ला,
ताड़ि, तनिकाय, तनि, तन्द्रा, तोन्दी । ता०-अक्रम, तन्री, तनितांडी, तोअण्डी, तोखांडी, तरिंकय,
तनी, कटटुएलुपय । मा०-बहेड़ा। प०-बहेड़ा । मु०-बहेड़ा। फा०-बलेले, बलेला, बलैलाह।
अ०-बलैलज़। अं०-Beleric Myrobalans; (बेलेरिक् मैरोबेलन्स) । Beddanut (बेड्डानट)। लै०-
Terminalia belerica Roxb. (टर्मिनेलिया बेलेरिका) । Fam. Combretaceae (कॉम्ब्रिटेसी)।
हमारे देश के प्रायः सब प्रान्तों में बहेड़े का वृक्ष देखने में आता है, विशेष कर नीचीं पहाड़ियों
पर अधिक पाया जाता है। यह जंगल, पहाड़ तथा ऊँची भूमि में उत्पन्न होता है।
वृक्ष-बहुत विशाल हुआ करता है। ऊँचाई ६० से १०० फीट तक होती है। स्तम्भ-
मोटा, सीधा, खड़ा, गोलाकार होता है। छाल-आधाइञ्च तक मोटी, कालापन युक्त या नीलापन युक्त
खाकी रंगकी होती है। लकड़ी-हल्की खाकी या किञ्चित् पीलापन युक्त होती है। शाखायें-
प्रायः ६ से १० फ़ीट लम्बी होती हैं किन्तु कभी कभी २० फीट लम्बी शाखायें भी देखने में आती हैं।
पत्ते-महुवे के पत्तों के समान ३ से ८ इञ्च तक लम्बे तथा २-३ इञ्च चौड़े होते हैं। ये विषमवर्ती
प्रायः छोटी छोटी टहनियों के अन्त में सघन रहते हैं। प्रायः पतझड़ में इसके सब पत्ते गिर जाते हैं
और चैत तक नवीन पत्ते निकल आते हैं। फूल-३ से ६ इञ्च तक लम्बी सींकों पर नन्हें फूलों की
१. 'स्यान्नाक्षः' इति पाठ० ।