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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

by भावमिश्र

Source: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (origin)

DevanagariSanskritpublished143 pages

Page 12 of 143

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Page 12

६ भावप्रकाशनिघण्टुः
कटु तिक्तादि रस होने से कफनाशक, एवं अम्ल रस होने से वातनाशक', वह केवल शिष्यों को
समझाने के लिये अर्थात् 'इन २ रसों में इन २ दोषों को दूर करने की शक्ति रहती है', शिष्यों
को यही बात समझाने के लिये हेतुओं का निर्देश करते हुये हरड़ की त्रिदोषनाशकता बताई गई
और जब कि-समान गुणों से युक्त होते हुये भी आश्रय भेद से द्रव्यों के कर्म में भिन्नता देखी
जाती है तब हरड़ में स्थित जो कटु तथा अम्ल रस हैं, वह क्यों नहीं पित्त तथा वात को उत्पन्न
करता है। इस विषय में हेतु विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है अर्थात् विचार करना
व्यर्थ है क्योंकि वह सब बातें प्रभाव से होती हैं न कि रसादि हेतुओं से, अम्ल और कटु रस
पित्त वात का जनक होने पर भी आश्रय विशेष में कर्म विशेष करने वाले होते हैं जैसे कि आंवला
तथा बड़हर ये दोनों यद्यपि रसादिकों में तुल्य हैं किन्तु फल खाने (गुणों) में तुल्य नहीं हैं। इसी
भांति हरड़की त्रिदोषनाशकता के विषय में भी समझना चाहिये ॥ २३-२६ ॥
अथ हरीतक्यां तद्रसादीनां स्थानान्याह
पथ्याया मज्जिन स्वादुः स्नाय्वामम्लो व्यवस्थितः। वृन्ते तिक्तस्त्वचि कटुश्स्थिस्थस्तुवरो रसः॥
**हरड़ में रसों के रहने के स्थान—**हरड़ की मींगी में मधुर रस, रेशों में आम्लरस, वृन्त
(ढेपी) में तिक्तरस, छिल्के में कटु रस और गुठली में कषाय रस रहता है ॥ २७ ॥
अथोत्तमहरीतक्या लक्षणान्याह
नवा स्निग्धा घना वृत्तागुर्वी चिया च याऽम्भसि । निमज्जेत्सा प्रशस्ता च कथिताऽतिगुणप्रदा ॥
नवादिगुणयुक्तावं तथैवात्र द्विकर्षता । हरीतक्याः फले यत्न द्वयं तच्छ्रेष्ठमुच्यते ॥ २९ ॥
**उत्तम हरड़ के लक्षण—**जो हरड़ नवीन, स्निग्ध, घन (ठोस), गोल और गुरु
(वजनदार) हो तथा जल में डालने पर डूब जाय वह उत्तम और अत्यन्त गुणकारी मानी जाती
है। जिस हरीतकी के फल में पूर्वोक्त नूतनता आदि सम्पूर्ण गुण हों एवं तौल भी उसका दो कर्ष
अर्थात् दो बहेड़े के बराबर हो वह उत्तम कही जाती है ॥ २८-२९ ॥
अथ हरीतक्याः प्रयोगभेदेन फलभेदानाह
चर्विता वर्द्धयत्यग्निं पेषिता मलशोधिनी । स्विन्ना संग्राहिणी पथ्या भृष्टा प्रोक्ता त्रिदोषनुत् ॥
उन्मीलनी बुद्धिवलेन्द्रियाणां निर्मूलिनी पित्तकफानिलानाम् ।
विभ्रंसिनी मूत्रशकृन्मलानां हरीतकी स्यात् सह भोजनेन ॥ ३१ ॥
अन्नपानकृतान्दोषान्वातपित्तकफोद्भवान् । हरीतकी हरत्याशु भुक्तस्योपरि योजिता ॥३२॥
लवणेन कफं हन्ति पित्तं हन्ति सशर्करा । घृतेन वातजान् रोगान्सर्वरोगान्गुडान्विता ॥३३॥
**हरीतकी के प्रयोग भेद से गुण भेद—**हरीतकी यदि चबा कर खाई जाय तो जठराग्नि की
वृद्धि करती है, शिला पर पीस कर खाई जाय तो मल शोधन करती है, उबाल कर खाई जाय तो
मल रोकती है, भून कर खाई जाय तो त्रिदोष को दूर करती है और भोजन के साथ सेवन करने
से बुद्धि, बल तथा इन्द्रियों को विकसित करने वाली, पित्त, कफ तथा वायु को नष्ट करने वाली,
एवं मूत्र, विष्ठा तथा मल पदार्थों का विरेचन करने वाली होती है। यदि वही हरीतकी भोजन
कर चुकने के बाद ऊपर से खाई जाय तो अन्न तथा पान सम्बन्धी दोषों को एवं वात पित्त तथा
कफ से उत्पन्न होने वाले विकारों को शीघ्र हरने वाली होती है। सेंधा नमक के साथ खाने से
कफ, शकर के साथ खाने से पित्त, घृत के साथ खाने से वात सम्बन्धी रोग और गुड़ के साथ
खाने से समस्त व्याधियों को दूर करने वाली होती है ॥ ३०-३३ ॥


हरीतक्यादिवर्गः ७
अथ रसायनगुणार्थिनां कृते हरीतकीप्रयोगविधिमाह
सिन्धूत्थशर्कराशुण्ठीकणामधुगुडैः क्रमात् । वर्षादिष्वभया प्राश्या रसायनगुणैषिणा ॥ ३४ ॥
**हरीतकी का रासायनिक प्रयोग—**जो रसायन के गुणों को प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं उन्हें
चाहिए कि वे वर्षा आदि छ ऋतुओं में क्रम से सेंधानमक, शकर, सोंठ, पीपल, मधु और गुड़ के
साथ हरीतकी का सेवन करें, अर्थात् वर्षा ऋतु में सेंधानमक के साथ, शरद ऋतु में शकर के साथ,
हेमन्त ऋतु में सोंठ के साथ, शिशिर ऋतु में पीपल के साथ, वसन्त ऋतु में मधु के साथ, एवं
ग्रीष्म ऋतु में गुड़ के साथ हरीतकी सेवन करने से रसायन के फल की प्राप्ति होती है ॥ ३४ ॥
अथ हरीतकी भक्षणानर्हजनानाह
अध्वातिखिन्नो बलवर्जितश्च रूक्षः कृशो लङ्घनकर्शितश्च ।
पित्ताधिको गर्भवती च नारी विमुक्तरक्तस्सभयां न खादेत् ॥ ३५ ॥
**हरीतकी सेवन करने के अयोग्य व्यक्ति—**रास्ता चलने से थके हुए, बल रहित, रूक्ष, कृश,
उपवास किए, अधिक पित्तवाले व्यक्ति तथा गर्भवती स्त्री एवं जिसे रक्तमोक्षण कराया गया हो
उन सबों को हरीतकी का सेवन नहीं करना चाहिये ॥ ३५ ॥
१ हरीतकी
**हि०-**हर, हरड, हरें, हरे, हड़, हर्डे, हर्र, हरर। **ब०-**हरीतकी, बालहरीतकी, हरीतकी
गाछ, नरीं। **म०-**हरडा, हिरडा, हरडे, हर्तकी, हरडी, बालहरडी । **गु०-**हरडे, हिमज।
**ते०-**करकचेट्टु, करकाप्प, करकाय । **ता०-**कडुकांय, करकैया, कडुकेमरम । **क०-**अणिलेय,
अणिले, अनिर्लकाय । **उड़ि०-**करैंधा, हरिडा करेड़ा। **दू०-**हलरा, कलरा । **मा०-**हरडे। **प०-**हड़,
हरड । **आसा०-**हिलिखा, सिलिखा । **लिपचा०-**सिलिम । **सिक्कम०-**हन, सिलिमकंग, सिलिम-
कुंग । **मैसूर-**अलले । **कच्छार-**होरतकी । **फा०-**हलेलज अरफर, हलेले जर्द, हलेलाह, हलेलह
जर्द । **अ०-**अहलीलज, एहलीलज-कावली, अहलीलज असफर, जहरीलज़, अस्वद, हलेलज़ असफर ।
**अं०-**Myrobalans (माइरोबेलन्स), Chebulic Myrobalans (चेब्यूलिक माइरोबेलन्स) ।
ले०-(१) Terminalia chebula Retz (टर्मिनेलिया चेब्युला) । (२) Terminalia
citrina Roxb (टर्मिनेलिया सिट्रिना)। Fam. Combretaceae (कॉम्ब्रिर्टेसी)।
**हरीतकी—**अत्यन्त सुगमता से सर्वत्र प्राप्त होने वाली किन्तु विविध गुण सम्पन्न औषधि का
फल है। इसका वृक्ष हमारे देश के प्रायः सब प्रान्तों में कहीं न कहीं पाया जाता है। यह उत्तर
भारत में बहुलता से उत्पन्न होती है। कुमाऊँ से बंगाल तक, आसाम, ब्रह्मा तथा दक्षिण में मद्रास
प्रान्त, कोयम्बतूर, कनारा, पश्चिमघाट के पूर्वीय प्रान्तों में, गजाम, गोदावरी की तलहटी, सतपुरा
पहाड़, गुजरात, बम्बई प्रान्त के घाटों के पास ऊँचे जंगलों में, कोंकण, मलबार, विन्ध्याचल
पहाड़, हिमालय पहाड़ एवं काबुल की ओर इसके वृक्ष अधिकता से देखने में आते हैं। इसका
वाटिकाओं में भी रोपण करते हैं।
प्रायः इसका वृक्ष मध्यमाकार का होता है किन्तु कहीं कहीं बड़े बड़े वृक्ष भी देखने में आते
हैं। नर्मदा के दक्षिण के वृक्ष १०० फीट तक ऊँचे होते हैं किन्तु उत्तर भारत में उत्पन्न हुए वृक्ष
इतने बड़े नहीं होते । हरीतकी के वृक्ष वट, पीपल, आदि वृक्षों की तरह दीर्घायु नहीं होते हैं,
बल्कि कालान्तर में सूख कर गिर जाया करते हैं। इसकी छाल कालापन युक्त भूरे रंग की चौथाई
इञ्च तक मोटी होती है । लकड़ी पक्की और बहुत मज़बूत होती है। इमारत के काम के लिये