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भक्तियोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Bhakti Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / प्रा. डॉ. विद्याभास्कर शुक्ल द्वारा

DevanagariHindipublished140 पृष्ठ

इस सूत्र (ब्रह्मसूत्र ४।४।१८) का रामानुज भाष्य देखिए।

१८

भक्तियोग

हैं, "यदि तुम कहो कि ऐसा नहीं है, वेदों में तो ऐसे अनेक श्लोक हैं, जो इसका खण्डन करते हैं, तो वास्तव में वेदों के उन-उन स्थानों पर केवल निम्न देवलोकों के सम्बन्ध में ही मुक्तात्मा का ऐश्वर्य वर्णित है।" § यह भी एक सरल मीमांसा है। यद्यपि रामानुज समष्टि की एकता स्वीकार करते हैं, तथापि

अतः सत्य संकल्पत्व-परमसाम्योपपत्तये समस्तजगनियमनरूपम् अपि मुक्तस्य ऐश्वर्यम इति। एवम् प्राप्ते प्रचक्ष्महे—जगद्व्यापारवर्जम् इति। जगद्व्यापारः-निखिलचेतनाचेतनस्वरूपस्थिति-प्रवृत्तिभेदनियमनम्, तद्वर्जम् निरस्तनिखिलतिरोधानस्य निर्व्याजब्रह्मानुभवरूपम् मुक्तस्य ऐश्वर्यम्। कुतः ? प्रकरणात्—निखिल जगन्नियमनम् हि परम् ब्रह्म प्रकृत्य आम्नायते—"यतः वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तत् विजिज्ञासस्व, तत् ब्रह्म" इति। यदि एतत् निखिलजगनियमनम् मुक्तानाम् अपि साधारणं स्यात्, ततः च इदम् जगदीशवरत्वरुपम् ब्रह्मलक्षणम् न संगच्छते; असाधारणस्य हि लक्षणत्वम्। तथा "सत्_ एव सोम्य इदम् अग्रे आसीत् एकम् एव अद्वितीयम्, तत्_ ऐक्षत बहुस्याम् प्रजायेय इति, तत् तेजः असृजत" "ब्रह्म वा इदम् एकम् एव अग्रे आसीत, तत् एकम् सत् न व्यभवत्, तत् श्रेयो रूपम् असृजत क्षत्रम्—यानि एतानि देवक्षत्राणि,—इन्द्रः, वरुणः, सोमः, रुद्रः, पर्जन्यः, यमः, मृत्युः, ईशानः इति" "आत्मा वा इदम् एकः एव अग्रे आसीत्, न अन्यत् किञ्चन मिषत्, स ऐक्षत लोकान् नु सृजा इति, स इमान् लोकान् असृजत" "एकः ह वै नारायणः आसीत्, न ब्रह्मा, न ईशानः, न इमे द्यावापृथिवि, न नक्षत्राणि, न आपः, न अग्निः, न सोमः, न सूर्यः, स एकाकी न रमेत, तस्य ध्यानान्त, स्थस्य एका कन्या दश इन्द्रियाणि" इति आदिषु, "यः पृथिव्याम् तिष्ठन् पृथिव्याः अन्तरः" इति आरम्य "यः आत्मनि तिष्ठन्" इति आदिषु च निखिलजगनियमनम् परमपुरुषम् प्रकृत्य एव श्रूयते। असन्निहितत्वात् च—न च एतेषु निखिलजगनियमन प्रसंगेषु मुक्तस्य सन्निधानम् अस्ति, येन जगद्व्यापारः तस्य अपि स्यात्। —ब्रह्मसूत्र, रामानुज भाष्य, ४।४।१७

§ "प्रत्यक्षोपदेशात् इति चेत् न, अधिकारिमंडलस्थोक्तेः।"

इस सूत्र (ब्रह्मसूत्र ४।४।१८) का रामानुज भाष्य देखिए।

ईश्वर का स्वरूप १९

उनके मतानुसार इस समष्टि के भीतर नित्य भेद है। अतएव यह् मत भी कार्यतः द्वैतभावात्मक होने के कारण, जीवात्मा और सगुण ब्रह्म (ईश्वर) में भेद बनाए रखना रामानुज के लिए कोई कठिन कार्य न था।

अब इस सम्बन्ध में प्रसिद्ध अद्वैतवादी का क्या कहना है, यह समझने का प्रयत्न करें। हम देखेंगे कि अद्वैतमत द्वैतमत की समस्त आशाओं और स्पृहाओं की किस प्रकार रक्षा और पूर्ति करता है, और फिर साथ ही किस प्रकार ब्रह्मभावापन्न मानव-जाति की परमोच्च गति के साथ सामंजस्य रखते हुए अपने भी सिद्धान्त का प्रतिपादन करता है। जो व्यक्ति मुक्तिलाभ के बाद भी अपने व्यक्तित्व की रक्षा के इच्छुक हैं—भगवान से स्वतन्त्र रहना चाहते हैं, उन्हें अपनी स्पृहाओं को चरितार्थ करने और सगुण ब्रह्म का सम्भोग करने का यथेष्ट अवसर मिलेगा। ऐसे लोगों के वारे में भागवत-पुराण में कहा है, "हे राजन्, हरि के गुण ही ऐसे हैं कि समस्त बन्धनों से मुक्त, आत्माराम ऋषि-मुनि भी भगवान की अहैतुकी भक्ति करते हैं।"‡

सांख्य में इन्हीं लोगों को प्रकृतिलीन कहा गया है; सिद्धि-लाभ के अनन्तर ये ही दूसरे कल्प में विभिन्न जगत् के शासन-कर्ता के रूप में प्रकट होते हैं। किन्तु इनमें से कोई भी कभी ईश्वर-तुल्य नहीं हो पाता। जो ऐसी अवस्था को प्राप्त हो गए हैं, जहाँ न सृष्टि है, न सृष्ट, न स्रष्टा, जहाँ न ज्ञाता है, न ज्ञान और न ज्ञेय, जहाँ न 'मैं' है, न 'तुम' और न 'वह',

‡ आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥
—श्रीमद्भागवत, १।७।१०