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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 778 में से

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पृष्ठ 8

[ ६ ]
✿ भगवान्में सम्प्रयोगात्मक-विप्रयोगात्मक उभय-
विध शृंगारकी एक कालमें प्रतिष्ठा ....... ८२
✿ भगवान्के अंगसंगसे ही भूषणोंकी शोभा ..... ८४
✿ भगवान्द्वारा माधुर्यभावयुक्त विचित्र वेश
धारण करना ............................................ ८६
✿ भगवान्द्वारा मयूरपिच्छ-धारण ................... ९१
✿ भगवान्द्वारा कानोंमें कर्णिकार-धारण ......... ९३
✿ पीताम्बरधारणका रहस्य ........................... ९३
✿ भगवान्के श्रीकण्ठमें वैजयन्ती-मालाकी
शोभा .................................................... ९५
✿ भगवान्की भूषणमयी शोभा ....................... ९६
✿ वेणुवादन .............................................. ९६
✿ रसस्वरूप श्रीकृष्णचन्द्रकी मंगलमयी लीला
भी रसस्वरूप है ..................................... ९८
✿ भगवान्के जन्म-कर्म बन्धनकारक नहीं हैं... ९९
✿ प्रथम भगवान्का भक्तमें रमण, अनन्तर
भक्तका भगवान्में रमण ........................... १००
✿ भगवान्का आत्माभिरमण ........................... १०२
✿ भगवान्के गुणगणोंके श्रवणसे अन्तःकरणमें
भगवान्का प्राकट्य ................................ १०३
✿ भगवान् पूर्ण स्वतन्त्र भक्त पूर्ण परतन्त्र .... १०५
✿ शरणागतिका स्वरूप ................................. १०५
✿ भक्तमें स्वातन्त्र्य और भगवान्में पारतन्त्र्य ...... १०५
✿ भगवद्धाम वृन्दावनकी अद्भुत शोभा ........ १०८
✿ भगवान्के चरणस्पर्शसे वृन्दावनकी भूमि
सौभाग्यशालिनी हो गयी ......................... १०९
✿ वृन्दाके आख्यानका रहस्य ........................ ११३
✿ वेणुरव-श्रवणका प्रभाव ............................ ११६
✿ वेणुरवमें भगवान्का स्वरूप तथा उनकी
लीला प्रतिष्ठित है .................................. ११९
✿ वृषभानुनन्दिनी और श्रीकृष्ण परस्पर अन्तरात्मा
हैं ....................................................... १२१
✿ इन्द्रियवानोंकी यही लालसा कि प्रभु
इन्द्रियग्राह्य होकर प्राप्त हों .................... १२१
✿ ध्यान लगानेकी रीति ............................... १२४
✿ व्रजांगनाओंका उपालम्भनयुक्त मनोभाव ..... १२६
✿ आसक्तिकी महिमासे गोपांगनाओंको श्रीकृष्ण-
बलरामके मनोहरभावयुक्त दर्शनकी
अनुभूति ............................................. १२७
✿ गोपांगनाओंद्वारा वेणु आदिके प्रति ईर्ष्याभाव .. १३१
✿ वृन्दावनका सौभाग्य ...................................... १३७
✿ वेणुनादसे आकृष्ट मयूरोंका नर्तन ............. १४१
९. चीरहरण ..................................................... १४२
✿ श्रुतियाँ ही व्रजकुमारियाँ बनीं ..................... १४४
✿ श्रुतियोंके दो भेद ......................................... १४५
✿ दण्डकारण्यनिवासी मुनिगण भी गोपकुमारियोंके
रूपमें प्रकट हुए ........................................... १४६
✿ गोपकुमारिकाओंद्वारा उत्तम वरकी प्राप्तिके
लिये देवी कात्यायनीका आराधन ........... १४६
✿ यमुनास्नानका माहात्म्य .............................. १४८
✿ कर्मयोग और भक्तियोगकी विलक्षणता ..... १४९
✿ भगवान्का व्रजकुमारिकाओंके साथ
परिहास .................................................... १५०
✿ प्रेममयी कुमारिकाओंद्वारा अपने वस्त्रोंकी
याचना ...................................................... १५१
✿ दुस्त्यज्य त्यागके कारण व्रजांगनाओंकी दिव्य
महिमा ...................................................... १५१
✿ दोषानुसन्धान करनेपर भी गोपांगनाएँ मनमोहन
श्रीकृष्णको भूल नहीं पातीं ....................... १५३
✿ सर्वव्यवधानशून्य निवारण हुए बिना जीवकी
कृतकृत्यता नहीं होती ................................. १५५
✿ सभी जीव भगवान्के परतन्त्र होते हैं ..... १५८
✿ भगवान् ही सबके मुख्य पति हैं ............ १५८
✿ राग, तृष्णा, मोह आदि निन्द्यभाव भी
भगवत्सम्बन्धसे अतिमूल्यवान् हो जाते हैं .... १५९
✿ अद्वैतसे सुन्दर द्वैत ...................................... १६०
✿ श्रीकृष्ण-संस्पृष्ट वस्त्रोंको धारणकर व्रजांगनाएँ
रसाक्रान्त हो उठीं ...................................... १६१
✿ भगवत्सम्मिलनकी उत्कट उत्कण्ठा ही
भक्ति है ................................................. १६२
✿ श्रीकृष्णलीला कृष्णके लिये ही है, किसी
दूसरेके लिये नहीं....................................... १६५
१०. व्रजभूमि ................................................. १६६
✿ व्रजभूमिका अद्भुत वैभव ............................ १६६
✿ नित्य-निकुंजकी श्रीवृन्दावनसे भी अधिक
रसमयता ................................................. १७०
११. श्रीरासलीलारहस्य ................................. १७१
✿ श्रीरासपंचाध्यायीके वक्ता व्यास-पुत्र महाज्ञानी
श्रीशुकदेवजी और श्रोता गर्भज्ञानी श्रीपरीक्षित्जीका
माहात्म्य ................................................... १७१