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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 778 में से

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पृष्ठ 10

[ ८ ]
१२. श्रीरासपंचाध्यायी .................................... ३३६
✿ गोपियोंके गर्वपहरणके लिये भगवान्
अन्तर्धान हो गये ..................................... ३३६
✿ गोपबालाओंका अन्तर्द्वन्द्व .......................... ३३६
✿ रासेश्वरके अन्तर्धान हो जानेपर व्रजांगनाओंकी
मनोदशा ................................................. ३३८
✿ श्रीकृष्णमय गोपियां भगवान्‌की चेष्टाओंका
अनुकरण करने लगीं .............................. ३३९
✿ भक्त और भगवान्—दोनोंकी विवशता ..... ३४०
✿ भगवदनुरक्त गोपियोंद्वारा भगवद्विस्मरणके लिये
उनमें दोषानुसन्धान ................................ ३४१
✿ भगवान्‌के अन्तर्धान होनेका हेतु—गोपियोंपर
कृपा करना ............................................. ३४३
✿ भगवान् भक्तपराधीन हैं ........................... ३४७
✿ लीलविहारीकी लीलाओंने व्रजांगनाओंको
स्ववश करके अपनी लीलाका सम्पादन कराया .. ३४८
✿ भगवान्‌के लीलानुकरणसे गोपियां अपनेको
'मैं श्रीकृष्ण ही हूँ'—ऐसा मानने लगीं ... ३४९
✿ गोपरामाओंका प्रेमोन्माद ............................ ३५२
✿ प्रेममें गुण-दोषकी परीक्षा या विवेकको
स्थान नहीं है ........................................... ३५३
✿ प्रेमकी दृढ़ताका एक दृष्टान्त .................. ३५४
✿ आप्तकाम पूर्णकाम भी लीलावादनमें तत्पर
रहते हैं ................................................ ३५५
✿ गोपांगनाओंके हृदयमें रहकर भगवान्‌ने उनकी
रक्षा की ................................................ ३५६
✿ प्रेमोद्रेकमें व्यवधान सह्य नहीं होता........ ३५७
✿ भक्तकी दृढ़ भावनासे भगवान् भक्तके अधीन
हो जाते हैं .......................................... ३५९
✿ गोपियोंकी प्रेमसमाधि भग्न होनेपर वे
श्यामसुन्दरको पुकारने लगीं ................... ३६०
✿ गोपांगनाओंका प्रेमविह्वल हो वृक्षों-
वनस्पतियोंसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना
तथा उत्तर न मिलनेपर दोषानुसन्धान करना ... ३६१
✿ गोपांगनाओंका कुरबक-अशोक आदिसे
श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना ................... ३७१
✿ गोपांगनाओंका तुलसी आदिसे श्यामसुन्दरके
विषयमें पूछना .................................... ३७५
✿ व्रजांगनाओंद्वारा तुलसीमें दोषानुसन्धान ..... ३८०
✿ भगवान्‌की पूजामें भावका प्राधान्य है, प्रचुर
उपचारोंका नहीं................................... ३८२
✿ भगवान्‌का सौन्दर्य-माधुर्य स्वयं भगवान्‌को
भी विस्मयमें डाल देता है ..................... ३८३
✿ प्रेमोन्मादिनी गोपांगनाओंका आम्र, प्रियाल आदि
वृक्षोंसे मनमोहन श्यामके विषयमें पूछना और
उत्तर न मिलनेपर उनपर असूया भाव रखना .. ३८६
✿ व्रजांगनाओंका प्रेमोन्माद .......................... ३९२
✿ गोपांगनाओंद्वारा पृथ्वीसे श्यामसुन्दरके
विषयमें पूछना....................................... ४००
✿ अघासुरकी मुक्ति ................................... ४०५
✿ मानसी-आराधनाकी महिमा ...................... ४०५
✿ निकुंजस्थ माधुर्यनिधि श्यामसुन्दरकी श्रेष्ठता—
एक रोचक दृष्टान्त .................................... ४०६
✿ भगवान्‌की लोकोत्तर अलकावलीका माधुर्य.. ४०७
✿ व्रजांगनाओंका वियोगिनी हरिणीसे श्याम-
सुन्दरके विषयमें पूछना ............................ ४१०
✿ गोपांगनाओंका सर्वातिशय माहात्म्य ......... ४१२
✿ श्यामाश्यामके मनोहररूपकी बाँकी झाँकी.. ४१५
✿ श्रीकृष्णको जिसने अपना सर्वस्व नहीं बनाया,
वह सोचनीय है .................................... ४१६
✿ गोपांगनाओंद्वारा हरिणियोंके सौभाग्यकी सराहना .. ४१७
✿ अपने प्रियतमके दर्शनोंकी तीव्र उत्कण्ठा ही
सच्ची प्रीति है ....................................... ४१९
✿ श्यामसुन्दरके दर्शनमें ही नेत्रोंके होनेका
साफल्य ................................................ ४२१
✿ हरिणीके प्रति ईर्ष्याभाव........................ ४२७
✿ गोपांगनाओंका मनमोहनके स्वरूपका
वर्णन करके वृक्षोंसे प्रश्न करना ............. ४२८
✿ लताओंसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना ..... ४३२
✿ श्रीरासपंचाध्यायीके पठन, श्रवण एवं मननका
फल—हृद्रोग-कामका सर्वथा विनाश ...... ४३७
✿ श्रीश्यामरसका आस्वादन होते ही अन्य
रस नीरस हो जाते हैं .......................... ४३७
✿ गोपांगनाओंद्वारा श्यामसुन्दरकी मधुर लीलाओंका
अनुकरण ............................................. ४३९
✿ गोपियोंद्वारा शकटासुर-तृणावर्त-उद्धार आदि
लीलाओंका अनुकरण ............................. ४४७
✿ भगवान्‌को वशमें करनेका एकमात्र साधन—
रागानुगा भक्ति ...................................... ४४७
✿ ऐश्वर्यभावसे भी अधिक माधुर्यभावकी
महत्ता—लीलाका एक दृष्टान्त ................ ४४९
✿ श्रीराधिकाजीमें पूर्णतम माधुर्यका प्रकाश ... ४४९