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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

About this granth

The Bhaishajya Ratnavali (भैषज्य रत्नावली) of Kaviraj Govind Das Sen is an Ayurvedic treatise on therapeutics, widely used by practitioners as a trusted collection of formulations. As the introduction to this edition points out, it gathers tested preparations of both kinds: herbal ones such as decoctions, powders, linctuses, asavas and arishtas, and mineral and metallic preparations from rasashastra, so that physicians of every level can use it.

The work proceeds disease by disease. Under each condition it gives the relevant formulations, for example decoctions of the five roots and the ten roots for fever, linctuses such as kutajavaleha, medicated ghee and oils, and remedies for hiccup and other ailments, with quantities of ingredients and methods of preparation.

This edition gives the verses with a Hindi commentary in prose order, enlarged, revised and translated by the late Vaidya Shankarlal, described as the author and commentator of many books. It was printed by Khemraj Shrikrishnadas at the Shri Venkateshwar Steam Press, Bombay, in Samvat 2009 (1952). At 1416 pages it is a reference work for students and practitioners.

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ७५९


एवं अण्डकी जड और जौके क्वाथमें हींग और कालानमक डालकर पान करने से शूलरोग दूर होता है ॥ १० ॥

सौवर्चलाम्लिकाजाजीमरिचैर्द्विगुणोत्तरैः ।
मातुलुङ्गरसैः पिष्ट्वा गुटिका वातशूलनुत् ॥ ११ ॥

कालानमक १ तोला, इमली २ तोले, कालाजीरा ४ तोले और कालीमिरच ८ तोले इनके चूर्णको एकत्र बिजौरानींबूके रसमें खरल करके ३-३ मासेकी गोलियाँ बनालेवे । ये गोलियाँ प्रतिदिन प्रातःकाल उष्ण जलके साथ खानेसे वातशूलको नष्ट करती हैं ॥ ११ ॥

बीजपूरकमूलं च घृतेन सह पाययेत् ।
जयेद्वातभवं शूलं कर्षमेकप्रमाणतः ॥ १२ ॥

बिजौरेनीम्बूकी जडको पीसकर दो तोले परिमाण लेकर घृतके साथ पान कराने से वातजन्य शूल दूर होता है ॥ १२ ॥

हिंग्वम्लवेतसव्योषयमानीलवणत्रिकैः ।
बीजपूररसोपेतैर्गुटिका वातशूलनुत् ॥ १३ ॥

हींग, अम्लवेत, सोंठ, पीपल, मिरच, अजवायन, सेंधानमक, कालानमक और विडनमक इनको समान भाग लेकर चूर्ण करलेवे । फिर सबको एकत्र करके बिजौरेनीम्बूके रसमें खरल करके तीन तीन मासेकी गोलियाँ उष्ण जलके साथ सेवन करनेसे वातज शूलको नष्ट करती हैं ॥ १३ ॥

बिल्वमूलतिलैरण्डं पिष्ट्वा चाम्लतुषाम्भसा ।
गुडिकां भ्रामयेदुष्णां वातशूलविनाशिनीम् ॥ १४ ॥

बेलकी जड, तिल और अण्डकी जड इनको एकत्र काँजीके साथ खरल करके गोली बनालेवे । इस गोलीको गरम करके पीडास्थानपर लेप (भ्रमण) करनेसे वातज शूल नष्ट होता है ॥ १४ ॥

तिलैश्च गुडिकां कृत्वा भ्रामयेज्जठरोपरि ।
गुडिका शमयत्येषा शूलं चैवातिदुस्तरम् ॥ १५ ॥

तिलोंको खट्टी काँजीमें पीसकर गोली बनावे । फिर उसको गरम करके पेटके ऊपर लेप करे । यह गोली दारुण वातशूलको भी दूर करदेती है ॥ १५ ॥

नाभिलेपाज्जयेच्छूलं सद्यः काञ्जिकान्वितः ।
जीवन्तीमूलकल्क वा सतैलः पार्श्वशूलनुत् ॥ १६ ॥

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ७५७


बदरास्थिप्रमाणेन गुटिकां कारयेद्भिषक् ।
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय तोयमुष्णं पिबेदनु ॥ ६१ ॥
शूलं च सर्वगुल्मं च अजीर्णं परिणामजम् ।
अन्त्रशूलं पङ्क्तिशूलं हृच्छूलं च विशेषतः ॥ ६२ ॥
कुक्षिशूलं पार्श्वशूलं पृथग्वातादिसम्भवम् ।
आमशूलमुदावर्त्तं नाशयेन्नात्र संशयः ॥ ६३ ॥

इमलीका क्षार ५ पल, पाँचों नमक प्रत्येक पांच पांच पल, जम्बीरी नींबूका रस दो प्रस्थ सबको एकत्र मर्दन करके, मन्दमन्द अग्निद्वारा पकावे । फिर शंखकी भस्म १२ पल एव हींग, सोंठ, मिरच, पीपल ये प्रत्येक चार चार तोले, शुद्ध पारा शुद्ध मीठा तेलिया और शुद्ध गन्धक ये प्रत्येक दो दो तोले लेकर सबको एकत्र मिश्रित करके जम्बीरीनींबूके रसमें तीन दिनतक खरल करके बेरका गुठलीकी बराबर गोलियाँ बनालेवे। इस औषधको प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करके ऊपरसे गरम जल पान करनेसे सर्व प्रकारके शूल, गुल्म, अजीर्णशूल, परिणामशूल, अन्त्र-शूल, पंक्तिशूल, हृदयशूल, विशेषकर कुक्षिशूल, पार्श्वशूल एवं वात, पित्त, कफ इन तीनों दोषोंसे पृथक् पृथक् उत्पन्नहुए शूल, आमशूल और उदावर्त्त ये सब रोग निस्सन्देह नाश होते हैं ॥ ५८-६३ ॥

शूलहरणयोग।

हरीतकी त्रिकटुकं कुचिला हिङ्गु सैन्धवम् ।
गन्धकं च समं सर्वं वटीं कुर्यात्सुखावहाम् ॥ ६४ ॥
लघुकोलप्रमाणां तु शस्यते प्रातरेव हि ।
एकैका वटिका ग्राह्या गुल्मशूलविनाशिनी ॥ ६५ ॥
ग्रहण्यामतिसारे च साजीर्णे मन्दपावके ।
योजयेदुष्णपयसा सुखमाप्नोति निश्चितम् ॥
सुवर्णं च भवेद्देहं सदोत्साहयुतं नृणाम् ॥ ६६ ॥

हरड, सोंठ, मिरच, पीपल, कुचला, हींग, सेंधानमक, और शुद्ध गन्धक सबको समान भाग लेकर एकत्र उत्तम प्रकारसे खरल करके छोटे बेरकी बराबर गोलियाँ बनालेवे। इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली उष्ण जलके साथ सेवन करे । यह औषध गुल्म और शूलरोगनाशक है । इसको संग्रहणी, अतिसार, अजीर्ण, मन्दाग्नि आदि रोगोंमें प्रयोग करनेसे अवश्य आरोग्य लाभ होता है । इसके सेवन करनेसे

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