भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ७५७
बदरास्थिप्रमाणेन गुटिकां कारयेद्भिषक् ।
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय तोयमुष्णं पिबेदनु ॥ ६१ ॥
शूलं च सर्वगुल्मं च अजीर्णं परिणामजम् ।
अन्त्रशूलं पङ्क्तिशूलं हृच्छूलं च विशेषतः ॥ ६२ ॥
कुक्षिशूलं पार्श्वशूलं पृथग्वातादिसम्भवम् ।
आमशूलमुदावर्त्तं नाशयेन्नात्र संशयः ॥ ६३ ॥
इमलीका क्षार ५ पल, पाँचों नमक प्रत्येक पांच पांच पल, जम्बीरी नींबूका रस दो प्रस्थ सबको एकत्र मर्दन करके, मन्दमन्द अग्निद्वारा पकावे । फिर शंखकी भस्म १२ पल एव हींग, सोंठ, मिरच, पीपल ये प्रत्येक चार चार तोले, शुद्ध पारा शुद्ध मीठा तेलिया और शुद्ध गन्धक ये प्रत्येक दो दो तोले लेकर सबको एकत्र मिश्रित करके जम्बीरीनींबूके रसमें तीन दिनतक खरल करके बेरका गुठलीकी बराबर गोलियाँ बनालेवे। इस औषधको प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करके ऊपरसे गरम जल पान करनेसे सर्व प्रकारके शूल, गुल्म, अजीर्णशूल, परिणामशूल, अन्त्र-शूल, पंक्तिशूल, हृदयशूल, विशेषकर कुक्षिशूल, पार्श्वशूल एवं वात, पित्त, कफ इन तीनों दोषोंसे पृथक् पृथक् उत्पन्नहुए शूल, आमशूल और उदावर्त्त ये सब रोग निस्सन्देह नाश होते हैं ॥ ५८-६३ ॥
शूलहरणयोग।
हरीतकी त्रिकटुकं कुचिला हिङ्गु सैन्धवम् ।
गन्धकं च समं सर्वं वटीं कुर्यात्सुखावहाम् ॥ ६४ ॥
लघुकोलप्रमाणां तु शस्यते प्रातरेव हि ।
एकैका वटिका ग्राह्या गुल्मशूलविनाशिनी ॥ ६५ ॥
ग्रहण्यामतिसारे च साजीर्णे मन्दपावके ।
योजयेदुष्णपयसा सुखमाप्नोति निश्चितम् ॥
सुवर्णं च भवेद्देहं सदोत्साहयुतं नृणाम् ॥ ६६ ॥
हरड, सोंठ, मिरच, पीपल, कुचला, हींग, सेंधानमक, और शुद्ध गन्धक सबको समान भाग लेकर एकत्र उत्तम प्रकारसे खरल करके छोटे बेरकी बराबर गोलियाँ बनालेवे। इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली उष्ण जलके साथ सेवन करे । यह औषध गुल्म और शूलरोगनाशक है । इसको संग्रहणी, अतिसार, अजीर्ण, मन्दाग्नि आदि रोगोंमें प्रयोग करनेसे अवश्य आरोग्य लाभ होता है । इसके सेवन करनेसे