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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 972 of 1416

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Page 972

९४० भैषज्यरत्नावली । ⌜प्लीहा-यकृत्-

जानीयाद् गुरुतो विभागमनयोर्यन्त्रादिकं चापरं
निर्दिष्टास्त्रय एव भेषजवराः स्वल्पो महान्मध्यमः ॥ ६४ ॥
स्फटिकार्यादिकासीसान्तचतुर्द्रव्यैः स्वल्पः ।
स्वर्णमाक्षिकादिकासीसत्रितयान्तैर्महान् ।
टङ्कणादिकासीसान्तैः सप्तभिर्द्रव्यैर्मध्यमः ॥

सोनामाखीसे लेकर कसीसतक औषधियोंका द्रव निकालना उत्तम महाद्राव कहलाता है । एवं सुहागेसे लेकर कसीसतक औषधोंका द्रव निकालना मध्यम द्राव और फटकरीसे लेकर कसीसपर्यन्त चार औषधोंका द्रव निकालना अल्पद्राव कहा-जाता है ॥ १६०-१६४ ॥

चित्रकघृत ।

चित्रकस्य तुलाक्वाथे घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
आरनालं तद्विगुणं दधिमण्डं चतुर्गुणम् ॥ ६५ ॥
पञ्चकोलकतालीशक्षारैर्लवणसंयुतैः ।
द्विजीरकनिशायुग्मैर्मरिचं तत्र दापयेत् ॥ ६६ ॥

सौ पल चीतेके क्वाथमें ६४ तोले घृतको पकावे । फिर काँजी १२८ तोले, दहीका तोड २५६ तोले एवं पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, तालीशपत्र, जवाखार, सैन्धानमक, जीरा, कालाजीरा, हल्दी, दारुहल्दी और मिरच इनके चूर्णको समान भाग लेकर उसमें डालकर उत्तम प्रकार घृतको सिद्ध करे ॥ ६५ ॥ ६६ ॥

प्लीहगुल्मोदराध्मानपाण्डुरोगारुचिज्वरान् ।
वस्तिहृत्पार्श्वकट्यूरुकूलोदावर्त्तपीनसान् ॥ ६७ ॥
हन्यात्पीतं तदर्शोऽङ्गं शोथघ्नं वह्निदीपनम् ।
बलवर्णकरं चापि भस्मकं च नियुच्छति ॥ ६८ ॥

यह घृत यथाविधि सेवन करने पर तिल्ली, गुल्म, उदररोग, अफरा, पाण्डु, अरुचि, ज्वर, वस्ति, हृदय, पसली, कमर और जंघाका शूल, उदावर्त्त, पीनस, बवासीर, सूजन और भस्मकादि रोगोंको शीघ्र दूर करता है तथा अग्निको बढ़ाता और बल-वर्णको उत्पन्न करता है ॥ ६७ ॥ ६८ ॥

पिप्पलीघृत ।

पिप्पलीकल्कसंयुक्तं घृतं क्षीरं चतुर्गुणम् ।
पचेत्प्लीहाग्निसादादियकृद्रोगहरं परम् ॥ ६९ ॥