भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९३९
एतद्वल्लचतुष्टयं सह गिलेच्छुण्ठया लवङ्गेन वा ।
तत्पश्चात्परिभावितं बहुगुणं ताम्बूलकं भक्षयेत् ॥ १६० ॥
यह महाद्रावक रस कौडियोंको बहुत शीघ्र भस्म करदेता है। संसारमें इसके संपूर्ण गुणोंका वर्णन करनेको कोई भी समर्थ नहीं है। इसकी ८ माशे परिमाण मात्राको सोंठके चूर्ण अथवा लौंगके चूर्णके साथ मिलाकर सेवन करे। पश्चात् सुगन्धित द्रव्योंसे सुवासित नागरपान भक्षण करे ॥ १६० ॥
प्रासङ्ग्यात्कथयामि ताञ्छृणु गुणानस्यैव कांश्चित्परान्
निःशेषं विनिहन्त्यसौ चिरभवान्यष्टोदराणि ध्रुवम् ।
गुल्मं पाण्डु हलीमकं सुकठिनामष्ठीलिकां कामलां
मन्दाग्निं विषमाग्नितां बहुविधान् शोथांश्च शूलानपि ॥ ६१ ॥
सर्वाशींसि भगन्दरान्कृमिगदान्पञ्चैव कासांस्तथा
हिक्काश्लीपदकोषवृद्धिमरुचिंव्याधिं महादारुणम् ।
नव्यं वा चिरजं ज्वरं बहुविधं छर्दिं कृमीन्विशतिं
यक्ष्माणं चिरजामवात पिडिकातीसारविस्फोटकम् ॥ ६२ ॥
उन्मादं स्वरभेदमर्बुदमपि स्वेदं च हृत्पाणिजं
जिह्वास्तम्भगलग्रहं चिरभवं ग्रीवारुजामुल्बणाम् ।
नासाकर्णशिरोऽक्षिवक्त्रजगदान्क्षुद्रामयांश्चापरान्
हन्यादेव विरोत्थितान्बहुविधानन्यांश्च रोगानपि ॥ ६३ ॥
प्रसङ्गसे इसके कुछ थोडेसे श्रेष्ठ गुणोंको कहता हूँ उनको सुनो-यह रस बहुत पुराने आठों प्रकारके उदररोग, गुल्म, पाण्डु, हलीमक, कठिनतम अष्ठीला, कामला, मन्दाग्नि, विषमाग्नि, सर्वप्रकारके शोथ, शूल, बवासीर, भगन्दर, कृमिरोग, खाँसी, हिचकी, प्लीहा, श्लीपद, अण्डकोषवृद्धि, अरुचि, नया अथवा पुराना सर्व प्रकारका ज्वर, वमन, राजयक्ष्मा, आमवात, पिडिका, विसर्प, विस्फोटकम, उन्माद, स्वरक्षय, अर्बुद, हृदय और हाथोंसे उत्पन्नहुआ स्वेदरोग, जीभका जकडना, गलग्रह, दारुण ग्रीवापीडा, नाक, कान, शिर, नेत्र और मुखके रोग, अन्य क्षुद्ररोग एवं नानाप्रकारके नये और पुराने सम्पूर्ण उत्कट विकारोंको तत्काल नष्ट करदेता है ॥६१-६३॥
एकः स्यादपरो हि टङ्गणमुखैर्द्रव्यैः परैः सप्तकै-
रन्यस्तु स्फटिकारिटङ्गणयवक्षाराग्रकासीसकैः ।