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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 968 of 1416

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Page 968

९३६ भैषज्यरत्नावली । [ प्लीहा-यकृत-

तदनन्तर वारुणीयन्त्रमें स्थापन कर धीरे धीरे मन्द मन्द अग्निद्वारा पाक कर द्रवीभूत करे अर्थात् अर्क खींचे। जब शीतल होजाय तब उस जलको काँचकी शीशीमें भरकर यत्नपूर्वक रक्खे। फिर प्रतिदिन प्रातःकाल इसकी रत्तीभर मात्राको पानमें लगाकर सेवन करे। यह-खाँसी, श्वास, क्षय, प्लीहा, अजीर्ण, संग्रहणी, रक्तपित्त, क्षत, गुल्म, बवासीर, अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, आठों प्रकारके शूल, आमवात, वातरक्त, खञ्जवात, धनुस्तम्भ, उदररोग, स्थूलता, कृमिरोग, कोष्ठबद्धता, वात पित्त और कफजन्य रोग तथा अन्यान्य सर्वप्रकारके रोगोंको संशयरहित तत्काल नाश करता है। कण्ठपर्यन्त भोजन करके रत्तीभर इस रसको चाटलेवे तो उसी क्षण किया हुआ भोजन इस प्रकार भस्म होजाता है, जिस प्रकार तृणोंके समूहको अग्निकण भस्म कर देता है ॥ ३६-४१ ॥

यामार्द्धं द्रावयेत्सर्वं शंखशुक्तिवराटिकान् ।
पूर्वोक्तविधिना तत्र दद्यान्निशि चतुष्पथे ॥ ४२ ॥
योगिनीभैरवाभ्यां च बलिं माषतिलानथ ।
महाशंखद्रवो नाम्ना शम्भुदेवेन भाषितः ॥ ४३ ॥
गुह्याद् गुह्यतमं गोप्यं पुत्रस्यापि न कथ्यते ।
लोकानां कौतुकात्कर्त्ता प्रकाश्यो राजसन्निधौ ॥ ४४ ॥

यह रस शंख, शुक्ति और कौडियोंको अर्द्धप्रहरमें ही गलादेता है। इसको सेवन करनेसे पहले पूर्वोक्त विधिके अनुसार अर्द्धरात्रिमें चौहारेपर योगिनी और भैरवोंके लिये उड़द और तिलोंकी बलि देवे। इस महाशंखद्रावनामक रसको श्रीशिवजीमहाराजने निर्मित किया है। यह गुप्तवस्तुसे भी अत्यन्त गुप्त है, इसको पुत्रसे भी नहीं कहना चाहिये। सांसारिक जीवोंको आश्चर्य्य चकित करनेके लिये केवल राजाओंके सामने प्रकाशित करे ॥ ४२-४४ ॥

महाद्रावक १-३ ।

यवक्षारस्य भागौ द्वौ स्फटिकारस्त्रयो मताः ।
एकीकृत्य प्रपिष्यापि मूत्रैर्वत्सतरीभवैः ॥ ४५ ॥
शुष्कं कृत्वा क्षिपेत्पात्रे सैसके वस्त्रलेपिते ।
अन्यत्सीसकपात्रं तु द्विमुखं मेलयेद् बुधः ॥ ४६ ॥
वृद्धवैद्योपदेशेन पचेत्पात्रस्थमौषधम् ।
ततः सान्निध्यसंस्थाप्यं रसः पात्रान्तरं लभेत् ॥ ४७ ॥
ततो रसं विनिष्कृष्य स्थापयेत्स्निग्धभाजने ॥ ४८ ॥