भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| ६४ | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा- |
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सन्निपातज्वरस्यान्ते कर्णमूले सुदारुणः ।
शोथः संजायते तेन कश्चिदेव प्रमुच्यते ॥ ३८ ॥
ज्वरादितो वा ज्वरमध्यतो वा
ज्वरान्ततो वा श्रुतिमूलशोथः
क्रमेण साध्यः खलु कृच्छ्रसाध्य-
स्ततस्त्वसाध्यः कथितो भिषग्भिः ॥ ३९ ॥
रक्तावसेचनैः पूर्वं सर्पिः पानैश्च तं जयेत् ।
प्रदेहैः कफपित्तघ्नैर्वमनैः कवलग्रहैः ॥ ४० ॥
कुलत्थकट्फलैः शुण्ठी कारवी च समांशकैः ।
सुखोष्णैर्लेपनं दद्यात् कर्णमूले मुहुर्मुहुः ॥ ४१ ॥
सन्निपातज्वरके अन्तमें कानके मूलमें भयंकर सूजन उत्पन्न होनेपर हो (कनबर निकलनेपर) तो उससे कदाचित् कोई रोगी आरोग्य होता है। ज्वरके आदिमें, ज्वरके मध्यमें और ज्वरके अन्तमें इस तरह तीन प्रकारका कर्णशोथ होता है। इसको क्रमसे साध्य, कष्टसाध्य और असाध्य जानना चाहिये, ऐसा आयुर्वेदज्ञ महर्षियोंने कहा है। कर्णमूलशोथमें प्रथम जोंक आदिके द्वारा रुधिरस्राव कराना चाहिये। फिर रोगीको पंचतिक्त आदि घृतपान कराना चाहिये। अथवा कफ-पित्तनाशक ओषधियोंके द्वारा वमन और कवल धारण कराके इन्हीं ओषधियोंके कल्कका शोथपर लेप करना चाहिये। या कुलथी, कायफल, सोंठ और काला-जीरा इनको समानभाग लेकर जलके साथ पीसलेवे, फिर गरम करके कनपटीपर बारम्बार सुहाता २ लेप करे ॥ ३८-४१ ॥
गैरिकं पांशुजः शुण्ठी वचा कट्फलकांजिकैः ।
कर्णशोथहरो लेपः सन्निपाते ज्वरे नृणाम् ॥ ४२ ॥
सुखोष्णदशमूलेन प्रलेपोऽतिमहाफलः ।
बीजपूरकमूलानि अग्निमन्थं तथैव च ॥ ४३ ॥
सनागरं देवदारुचव्यचित्रकपेषितम् ।
प्रलेपनमिदं श्रेष्ठं गलश्वयथुनाशनम् ॥ ४४ ॥
गेरू, पांशुलवण (रेह), सोंठ, वच और कायफल इन ओषधियोंको समान भाग लेकर उसका चूर्ण बनाकर काँजीमें पीसकर गरम करके लेप करे ।